नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए मौजूदा वक्त किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। दिल्ली की सत्ता हाथ से जाने के बाद अब संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी पार्टी को अपनी सबसे बड़ी टूट का सामना करना पड़ा है। शनिवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह घोषणा की कि पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में विलय कर लिया है। सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र राज्यसभा के सभापति को भी सौंप दिया गया है। इस बगावत के बाद संसद में ‘आप’ का कुनबा 13 से घटकर महज 6 पर सिमट गया है।
सांसदों की बगावत: अंदरूनी कलह और घटते कद की कहानी?
पार्टी सूत्रों की मानें तो राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल को लेकर अंदरूनी सुगबुगाहट पहले से ही थी। स्वाति मालीवाल पिछले काफी समय से पार्टी लाइन से अलग बयानबाजी कर रही थीं। वहीं, संगठन की जिम्मेदारी संभालने वाले संदीप पाठक का कद लोकसभा चुनावों के बाद लगातार कम होता गया, जिससे उनकी सक्रियता भी घट गई थी। गौर करने वाली बात यह है कि बागी हुए 7 सांसदों में से 4 कारोबारी पृष्ठभूमि से हैं। पार्टी में उन्हें शामिल किए जाने के वक्त से ही उनकी निष्ठा पर सवाल उठते रहे थे। अब इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का पाला बदलना पार्टी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
कानूनी लड़ाई की तैयारी: कोर्ट का रुख करेगी आम आदमी पार्टी
इस सियासी झटके के बाद ‘आप’ ने जवाबी कार्रवाई की तैयारी तेज कर दी है। पार्टी के शीर्ष नेताओं का कहना है कि वे राज्यसभा के सभापति से इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने और उन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग करेंगे। यदि इस प्रक्रिया में देरी होती है, तो पार्टी उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाने से भी पीछे नहीं हटेगी। हालांकि, राज्यसभा के गलियारों में चर्चा है कि यदि दो-तिहाई सांसद एक साथ विलय का पत्र सौंपते हैं, तो सभापति उसे स्वीकार कर सकते हैं, जिससे पार्टी के पास केवल अदालती रास्ता ही बचेगा।
सिर्फ दिल्ली-पंजाब नहीं, अब गुजरात और गोवा में भी सेंधमारी का डर
आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने विधायकों को एकजुट रखने की है। दिल्ली में विधायक आले इकबाल ने पहले ही बगावती तेवर दिखा दिए हैं, जब उन्होंने पार्टी के बहिष्कार के फैसले के खिलाफ जाकर विधानसभा सत्र में हिस्सा लिया। गुजरात में भी पार्टी को डर सता रहा है क्योंकि बीजेपी पहले भी वहां ‘आप’ के संगठन में सेंध लगा चुकी है। अरविंद केजरीवाल इस साल पांच बार गुजरात का दौरा कर चुके हैं और वहां संगठन को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। यदि गुजरात के 5 विधायकों में भी कोई टूट होती है, तो यह पार्टी के भविष्य के लिए घातक साबित हो सकता है।
पंजाब की डगर भी हुई कठिन
दिल्ली के बाद पंजाब ही ‘आप’ का सबसे मजबूत किला है, लेकिन राज्यसभा की इस टूट का असर वहां की राजनीति पर पड़ना तय है। पंजाब से आने वाले सांसदों के जाने से कैडर के मनोबल पर चोट पहुंची है। अब अरविंद केजरीवाल के सामने न सिर्फ पार्टी के बिखराव को रोकने की चुनौती है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए संगठन को दोबारा खड़ा करने का बड़ा लक्ष्य भी है।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया
