राफेल F-5 प्रोजेक्ट में फ्रांस को बड़ा झटका: 3.9 अरब डॉलर की मेगा डील अधर में लटकी

ग्लोबल डिफेंस मार्केट और फाइटर जेट इंडस्ट्री में उस वक्त सनसनी फैल गई जब फ्रांस के अत्याधुनिक राफेल F-5 (Rafale F-5 Super Fighter Jet) प्रोजेक्ट को लेकर एक बहुत बड़ी और अप्रत्याशित खबर सामने आई। संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई (UAE) के साथ होने वाली फ्रांस की करीब 3.9 अरब डॉलर (लगभग 32,000 करोड़ रुपये) की विशालकाय डिफेंस डील अब भारी विवादों के चलते टूटती हुई नजर आ रही है। राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) के लिए यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक और वित्तीय झटका माना जा रहा है क्योंकि यूएई लंबे समय से राफेल जेट्स का एक प्रमुख और विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय खरीदार रहा है।

अचानक दोनों देशों के बीच उभरे गहरे मतभेदों ने इस महत्वाकांक्षी 5th जनरेशन स्टील्थ सुपर जेट प्रोजेक्ट पर अनिश्चितता के काले बादल मंडरा दिए हैं। इस डील के खटाई में पड़ने के बाद अब वैश्विक रक्षा विश्लेषक इस बात का बारीकी से आकलन कर रहे हैं कि आखिर दो मित्र देशों के बीच इतनी बड़ी डील के अचानक पटरी से उतरने की असली वजह क्या रही और इससे मध्य पूर्व (Middle East) के सामरिक शक्ति संतुलन पर क्या असर पड़ेगा।

आखिर क्यों हुआ फ्रांस और यूएई के बीच विवाद? जानिए अंदर की पूरी कहानी

फ्रांस और यूएई के बीच 3.9 अरब डॉलर की इस मेगा डील में दरार आने के पीछे केवल एक वजह नहीं है, बल्कि इसके पीछे तकनीकी संप्रभुता (Technical Sovereignty), डेटा शेयरिंग और भू-राजनीतिक सुरक्षा चिंताएं शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, विवाद की सबसे मुख्य और प्रमुख वजह राफेल F-5 जेट में इस्तेमाल होने वाली अगली पीढ़ी की अत्याधुनिक 'लॉयल विंगमैन' (Loyal Wingman) स्टील्थ ड्रोन तकनीक, एवियोनिक्स और उसके एडवांस कोड्स का एक्सेस है। यूएई इस प्रोजेक्ट में केवल एक ग्राहक के रूप में नहीं, बल्कि एक को-डेवलपर और टेक्नोलॉजी पार्टनर के तौर पर शामिल होना चाहता था।

यूएई की मांग थी कि उसे फाइटर जेट के क्रिटिकल सॉफ्टवेयर, रडार सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हथियार नियंत्रण प्रणालियों में पूर्ण पहुंच और स्थानीय स्तर पर असेंबल करने की आजादी दी जाए। लेकिन फ्रांसीसी रक्षा मंत्रालय और डसॉल्ट एविएशन अपनी बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) और कोर स्टील्थ टेक्नोलॉजी को किसी भी बाहरी देश के साथ साझा करने के मूड में बिल्कुल नहीं थे। इसी तकनीकी हस्तांतरण और मालिकाना हक की शर्तों पर दोनों पक्षों की बातचीत अटक गई और धीरे-धीरे विवाद इतना बढ़ गया कि डील टूटने के कगार पर पहुंच गई।

अमेरिकी दबाव और चीन का एंगल भी बना विवाद की बड़ी वजह

इस हाई-प्रोफाइल रक्षा सौदे के टूटने के पीछे केवल फ्रांस और यूएई के आपसी मतभेद ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि पर्दे के पीछे अमेरिका और चीन के बीच चल रही भयंकर ट्रेड और टेक्नोलॉजी वार का भी गहरा असर पड़ा है। यूएई हाल के वर्षों में चीन की टेलीकॉम दिग्गज हुआवेई (Huawei) के 5G नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर और चीनी सर्विलांस तकनीकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। फ्रांसीसी और पश्चिमी खुफिया एजेंसियों को यह गंभीर आशंका थी कि यदि राफेल F-5 जैसे अति-संवेदनशील और अत्याधुनिक सुपर जेट की तकनीक और डेटा लिंक्स यूएई के पास जाते हैं, तो चीन अपने खुफिया नेटवर्क के जरिए इन गोपनीय तकनीकों को चुरा सकता है या इंटरसेप्ट कर सकता है।

फ्रांस पर इस बात का भारी दबाव था कि वह अपने सबसे उन्नत फाइटर जेट के डेटा को किसी भी ऐसे नेटवर्क से दूर रखे जो चीनी तकनीकों से जुड़ा हो। जब फ्रांस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए कड़े प्रतिबंध और शर्तें लागू करने की कोशिश की, तो यूएई ने इसे अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप माना और सौदे से पीछे हटने का मन बना लिया।

डसॉल्ट एविएशन और फ्रांस के रक्षा उद्योग पर क्या पड़ेगा इसका असर

3.9 अरब डॉलर की इस विशाल डील का खटाई में पड़ना फ्रांस के एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। राफेल F-5 स्टैंडर्ड को भविष्य का सबसे घातक फाइटर जेट माना जा रहा है, जिसे विशेष रूप से परमाणु हमले करने में सक्षम मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों को ले जाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के शुरुआती रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में अरबों डॉलर का खर्च आ रहा है, जिसके लिए फ्रांस विदेशी साझेदारों से मिलने वाली फंडिंग पर काफी हद तक निर्भर था।

यूएई के इस प्रोजेक्ट से हाथ खींचने या सौदे को ठंडे बस्ते में डालने के बाद फ्रांस को अब इस पूरे प्रोजेक्ट का भारी-भरकम वित्तीय बोझ खुद अपने दम पर उठाना पड़ेगा या फिर भारत जैसे किसी अन्य बड़े खरीदार देश की ओर देखना होगा। डसॉल्ट एविएशन के शेयरों और कंपनी के भविष्य के निर्यात ऑर्डर बुक पर भी इस घटनाक्रम का नकारात्मक असर पड़ना तय माना जा रहा है।

भविष्य के ग्लोबल फाइटर जेट मार्केट और मध्य पूर्व पर इसका असर

यूएई और फ्रांस के बीच पैदा हुए इस गतिरोध के बाद मध्य पूर्व की पूरी रक्षा खरीद रणनीति एक नया मोड़ ले सकती है। राफेल F-5 डील में अड़चन आने के बाद अब यह माना जा रहा है कि यूएई अपने लड़ाकू विमान बेड़े के आधुनिकीकरण के लिए अन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है। यूएई एक तरफ जहां अमेरिका से F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स हासिल करने के लिए नए सिरे से कूटनीतिक दबाव बना सकता है, वहीं दूसरी तरफ वह ब्रिटेन, इटली और जापान के साझेदार 'ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम' (GCAP) या फिर दक्षिण कोरिया के KF-21 प्रोजेक्ट की तरफ भी अपना रुख कर सकता है।

दूसरी ओर, इस पूरी घटना ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आधुनिक युद्ध तकनीक के दौर में अब केवल प्लेन बेचना काफी नहीं है, बल्कि तकनीक का हस्तांतरण और डेटा सुरक्षा ही भविष्य के बड़े रक्षा सौदों की दिशा तय करेगी।

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