मेडिकल स्टोर से असली समझकर नकली दवा तो नहीं ला रहे घर? जानलेवा हो सकता है फर्जी दवाओं का सेवन; पैकेजिंग, QR कोड और इन 6 आसान तरीकों से मिनटों में करें असली-नकली की पहचान

जब भी कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है, तो वह जल्द से जल्द स्वस्थ होने की उम्मीद के साथ डॉक्टर के पास जाता है और मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदता है। लेकिन सोचिए कि जिस दवा को आप अपनी या अपने परिजनों की जान बचाने के लिए खरीद रहे हैं, यदि वही दवा नकली, मिलावटी या निष्प्रभावी निकले तो क्या होगा? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के अनुसार, विकासशील देशों में बिकने वाली कुल दवाओं में से एक बड़ा हिस्सा नकली (Spurious/Counterfeit) या सब-स्टैंडर्ड गुणवत्ता का होता है।

नकली दवाएं न केवल मरीज की बीमारी को ठीक करने में नाकाम रहती हैं, बल्कि इनमें मिलाए गए हानिकारक केमिकल, चॉक पाउडर, स्टार्च और दूषित तत्व किडनी, लिवर और हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई मामलों में एंटीबायोटिक्स या जीवनरक्षक दवाओं का नकली होना मरीज की जान तक ले लेता है। ऐसे में एक जागरूक नागरिक और उपभोक्ता के रूप में यह जानना बेहद जरूरी है कि मेडिकल स्टोर से दवा खरीदते समय असली और नकली दवा की पहचान कैसे की जाए।

पैकेजिंग, स्पेलिंग और ब्रांड लोगो की बारीकी से जांच करें

नकली दवा बनाने वाले माफिया अक्सर असली ब्रांड के नाम और पैकेजिंग की हूबहू नकल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन आधुनिक प्रिंटिंग और पैकेजिंग मानकों के अभाव में वे कुछ गलतियां जरूर छोड़ देते हैं:

  • स्पेलिंग की गलतियां (Spelling Mistakes): दवा के पत्ते (स्ट्रिप) या शीशी पर लिखे ब्रांड नाम, कंपनी के नाम और फॉर्मूलेशन की स्पेलिंग को बहुत ध्यान से पढ़ें। जालसाज कॉपीराइट से बचने या अनजाने में अक्षरों को थोड़ा बदल देते हैं (जैसे ‘Paracetamol’ की जगह ‘Paracetamal’ या ‘Cipla’ की जगह ‘Cipila’)।

  • फॉन्ट और प्रिंटिंग की गुणवत्ता: असली फार्मास्युटिकल कंपनियां उच्च गुणवत्ता वाली पैकेजिंग मशीनों का उपयोग करती हैं। असली दवा पर लिखावट एकदम स्पष्ट, शार्प और एक समान होती है। यदि फॉन्ट का आकार असमान हो, स्याही फैली हुई दिखे या उंगली से रगड़ने पर छपाई मिटने लगे, तो वह दवा नकली हो सकती है।

  • कंपनी का लोगो और होलोग्राम: प्रतिष्ठित कंपनियों के रैपर पर 3D होलोग्राम या विशेष सिक्योरिटी लोगो लगे होते हैं, जो रोशनी में देखने पर चमकते और रंग बदलते हैं। नकली दवाओं में यह होलोग्राम सादा स्टीकर जैसा होता है।

क्यूआर कोड (QR Code) और बारकोड से करें दवा का डिजिटल सत्यापन

भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने शीर्ष 300 सर्वाधिक बिकने वाली दवाओं के फॉर्मूलेशन पर ‘ट्रैक एंड ट्रेस’ (Track and Trace) बारकोड या क्यूआर कोड लगाना अनिवार्य कर दिया है:

  • स्मार्टफोन से स्कैनिंग: दवा की स्ट्रिप या बोतल पर छपे क्यूआर कोड को अपने मोबाइल फोन के सामान्य स्कैनर या गूगल लेंस से स्कैन करें।

  • डिजिटल डाटा का मिलान: स्कैन करते ही स्क्रीन पर दवा का वास्तविक नाम, यूनिक प्रोडक्ट कोड, बैच नंबर, निर्माण तिथि (Mfg Date), समाप्ति तिथि (Exp Date) और निर्माता कंपनी का पूरा नाम दिखाई देगा।

  • विसंगति होने पर अलर्ट: यदि क्यूआर कोड स्कैन करने पर कोई जानकारी न खुले, किसी फर्जी वेबसाइट का लिंक आए या स्क्रीन पर दिखने वाली जानकारी दवा के पत्ते पर छपी जानकारी से मेल न खाए, तो तुरंत समझ जाएं कि दवा संदेहास्पद या नकली है।

दवा की भौतिक स्थिति (रंग, बनावट, गंध और घुलनशीलता) पर दें ध्यान

यदि आप नियमित रूप से किसी पुरानी बीमारी (जैसे बीपी, शुगर, थायराइड) की दवा ले रहे हैं, तो दवा के रंग-रूप में आने वाले मामूली बदलाव को भी नजरअंदाज न करें:

  • गोलियों का टूटना और भुरभुरा होना: पत्ते से गोली निकालते समय यदि वह आसानी से टूटने लगे, चूरा बनने लगे या उसमें दरारें दिखाई दें, तो वह खराब क्वालिटी की निशानी है।

  • रंग में असमानता: असली दवा की गोलियों का रंग पूरी तरह एक समान होता है। यदि गोली पर कहीं हल्के तो कहीं गहरे रंग के धब्बे या पैच नजर आएं, तो ऐसी दवा का सेवन न करें।

  • कैप्सूल में नमी या चिपचिपापन: अच्छी गुणवत्ता वाले कैप्सूल सूखे और कड़े होते हैं। यदि कैप्सूल आपस में चिपके हुए हों, पिलपिले हो गए हों या उनसे पाउडर बाहर रिस रहा हो, तो वे दूषित हो सकते हैं।

  • सिरप और सस्पेंशन की जांच: कफ सिरप या एंटीबायोटिक सस्पेंशन की बोतल को हिलाने पर यदि उसमें तलहटी में कड़े थक्के या गाद जमी रह जाए, तो वह दवा मिलावटी हो सकती है।

  • असामान्य गंध या स्वाद: यदि दवा से किसी प्रकार की तेज रासायनिक दुर्गंध, फफूंद जैसी गंध या उसका स्वाद रोज के मुकाबले बहुत ज्यादा अलग और कड़वा लगे, तो उसका सेवन तुरंत रोक दें।

दवा खरीदते समय ‘पक्का बिल’ मांगना क्यों है जीवन सुरक्षा की गारंटी?

अक्सर लोग चंद रुपये बचाने के चक्कर में या जल्दबाजी में मेडिकल स्टोर से बिना बिल के दवाएं खरीद लेते हैं। यह आपकी सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है:

  • बिल पर अनिवार्य विवरण: हमेशा कम्प्यूटराइज्ड या जीएसटी युक्त पक्का बिल लें। सुनिश्चित करें कि बिल पर दवा का नाम, निर्माता कंपनी, बैच नंबर (Batch No.) और एक्सपायरी डेट स्पष्ट रूप से दर्ज हो।

  • जालसाजों की रणनीति: नकली दवा बेचने वाले दुकानदार कभी भी उस दवा का पक्का बिल नहीं देते, क्योंकि बिल कानूनी दस्तावेज होता है।

  • कानूनी कार्रवाई में मददगार: यदि दवा के सेवन से कोई साइड इफेक्ट होता है या दवा नकली पाई जाती है, तो आपके पास मौजूद पक्का बिल ही औषधि विभाग में शिकायत दर्ज कराने और मुआवजा पाने का सबसे ठोस सबूत होता है।

दवा के बैच नंबर और एक्सपायरी डेट की दोहरी जांच करें

हर दवा के स्ट्रिप और उसके बाहरी बॉक्स पर बैच नंबर और निर्माण/समाप्ति तिथि अंकित होती है:

  • डबल प्रिंटिंग या ओवरराइटिंग: कभी भी ऐसी दवा न खरीदें जिस पर एक्सपायरी डेट को खुरचकर या उसके ऊपर दोबारा नई तारीख छापी गई हो।

  • स्ट्रिप और बॉक्स का मिलान: यदि आप पूरा डिब्बा खरीद रहे हैं, तो यह जांचें कि डिब्बे के बाहर लिखा बैच नंबर और अंदर मौजूद स्ट्रिप्स का बैच नंबर बिल्कुल एक जैसा हो।

अत्यधिक भारी डिस्काउंट और अज्ञात ऑनलाइन वेबसाइटों से रहें सावधान

इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में सस्ती दवाओं के विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए कई प्लेटफॉर्म्स भारी छूट का लालच देते हैं:

  • अविश्वसनीय छूट से बचें: यदि कोई मेडिकल स्टोर या गैर-प्रमाणित वेबसाइट जीवनरक्षक दवाओं पर 50 से 70 प्रतिशत तक की अवास्तविक छूट दे रही है, तो सतर्क हो जाएं। दवा निर्माण की एक निश्चित लागत होती है; अत्यधिक सस्ती दवाएं अक्सर एक्सपायर्ड, चोरी की या नकली होती हैं।

  • प्रमाणित फार्मेसी से ही खरीदारी: दवाएं हमेशा लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर्स या जाने-माने और पंजीकृत ऑनलाइन ई-फार्मेसी पोर्टल्स से ही खरीदें।

नकली दवा का संदेह होने पर कहां और कैसे दर्ज कराएं शिकायत?

यदि आपको किसी मेडिकल स्टोर से खरीदी गई दवा के नकली, मिलावटी या घटिया होने का संदेह होता है, तो चुप बैठने के बजाय तुरंत उचित मंच पर शिकायत दर्ज कराएं:

  • राज्य औषधि नियंत्रण विभाग (State Drug Controller): अपने जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय या ड्रग इंस्पेक्टर (Drug Inspector) को लिखित शिकायत दें और दवा का सैंपल व बिल साथ ले जाएं।

  • राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline): उपभोक्ता टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके या ‘Consumer App’ के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

  • CDSCO और स्वास्थ्य मंत्रालय का पोर्टल: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ‘Spurious Drug’ सेक्शन में गोपनीय तरीके से सूचना दी जा सकती है।

दवाएं सीधे हमारे जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ी होती हैं। थोड़ी सी सतर्कता, पैकेजिंग की सजग जांच और पक्का बिल लेने की आदत आपको और आपके पूरे परिवार को नकली दवाओं के जानलेवा जाल से पूरी तरह सुरक्षित रख सकती है। जब भी दवा खरीदें, अपनी आंखें खुली रखें और स्वास्थ्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

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