नई दिल्ली। हिंदू धर्म में वैसे तो साल की सभी 24 एकादशियां बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, लेकिन इन सबमें सबसे बड़ी और कठिन ‘निर्जला एकादशी’ का स्थान सर्वोच्च है। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति साल भर की अन्य एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता है, तो उसे केवल निर्जला एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से रख लेना चाहिए। अकेले इसी एक व्रत के पुण्य से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल एक साथ प्राप्त हो जाता है।
पंचांग के अनुसार, इस साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी 25 जून 2026 को निर्जला एकादशी का महापर्व मनाया जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु (श्रीहरि) की प्रसन्नता के लिए बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किए (निर्जल) उपवास रखने का विधान है। इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ ‘दान’ करने का भी महा-महात्म्य बताया गया है। पद्मपुराण के अनुसार, इस दिन किए गए विशेष दानों से साधक सीधे बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। आइए जानते हैं जलधेनु और घृतधेनु के अलावा इस दिन किन-किन चीजों का दान सबसे उत्तम माना गया है।
क्या होता है जलमयी धेनु (जलधेनु) और घृतमयी धेनु (घृतधेनु) का दान?
पद्मपुराण के अनुसार, ज्येष्ठ के तपने वाले महीने में जब भीषण गर्मी होती है, तब भगवान विष्णु जल में शयन करते हैं। ऐसे समय में श्रीहरि के पूजन के बाद जलमयी धेनु और घृतमयी धेनु के दान का विशेष महत्व है।
इसका सीधा अर्थ है कि यदि सामर्थ्य हो तो साक्षात उत्तम गाय (गौदान) का दान करना चाहिए। यदि वास्तविक गाय का दान संभव न हो, तो गाय के प्रतीक स्वरूप या गाय के वजन के बराबर शीतल जल और शुद्ध देसी घी का दान किसी योग्य ब्राह्मण को आदर सहित करना चाहिए। इस दान के साथ पर्याप्त दक्षिणा भी अवश्य देनी चाहिए।
निर्जला एकादशी पर इन चीजों का दान भी माना गया है महाकल्याणकारी
भीषण गर्मी के इस मौसम को ध्यान में रखते हुए शास्त्रों में निर्जला एकादशी के दिन कुछ अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं के दान की सूची दी गई है, जिन्हें करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं:
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जल और घड़े का दान: इस दिन प्यासे लोगों को शीतल जल पिलाना, राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाना और किसी मंदिर या ब्राह्मण को मिट्टी के घड़े (मटके) का दान करना अमिट पुण्य देता है।
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अन्न और वस्त्र दान: भूखों को भोजन या अनाज (गेंहू, चावल आदि) और जरूरतमंदों को साफ-सुथरे सूती वस्त्रों का दान करने से घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती।
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छाता और जूता दान: चिलचिलाती धूप से बचने के लिए छाता (अंब्रेला) और नंगे पैर चलने वालों को जूते या चप्पल का दान करने से राहु-केतु के दोष शांत होते हैं और श्रीहरि की विशेष कृपा मिलती है।
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शय्या, सुन्दर आसन और कमण्डलु: साधु-संतों या ब्राह्मणों को बैठने के लिए सुंदर आसन, विश्राम के लिए शय्या (बिस्तर) और जल रखने के लिए कमंडलु का दान करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
मिलता है 200 पीढ़ियों को मोक्ष: यह है पद्मपुराण की महिमा
पद्मपुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति निर्जला एकादशी के दिन विधि-विधान से भगवान वासुदेव की पूजा करता है, दान-पुण्य करता है और रात में सोए बिना भजन-कीर्तन (रात्रि जागरण) करता है, वह केवल खुद का कल्याण नहीं करता। ऐसा महान साधक अपनी बीती हुई 100 पीढ़ियों को और आने वाली 100 पीढ़ियों को (कुल 200 पीढ़ियों को) भगवान विष्णु के परम धाम यानी बैकुंठ में पहुंचा देता है।
व्रत की शुरुआत के लिए कैसे लें संकल्प?
निर्जला एकादशी का व्रत बेहद कठिन है क्योंकि इसमें आचमन के जल के सिवा पूरे दिन और रात पानी की एक बूंद भी गले से नीचे उतारना वर्जित होता है। व्रत की शुरुआत में सुबह सूर्योदय के समय हाथ में जल लेकर संकल्प लें: “हे भगवान केशव! मैं आपकी प्रसन्नता के लिए और अपने पापों के नाश के लिए एकादशी को निराहार और निर्जल रहकर व्रत करूंगा/करूंगी। द्वादशी के दिन (अगले दिन सुबह) पूजन के बाद ही पारण करूंगा/करूंगी।” इसके बाद अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद भगवान विष्णु के पूजन और ब्राह्मण भोज के बाद ही व्रत खोला जाता है।
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