बांग्लादेशी जोड़े की फांसी के बाद एक और मृत्युदंड पर भड़का जनआक्रोश

सऊदी अरब में सख्त इस्लामी कानूनों (ताजीर) के तहत सजा-ए-मौत के मामले एक बार फिर वैश्विक मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के केंद्र में आ गए हैं। हाल ही में पवित्र शहर मक्का स्थित मस्जिद की पवित्रता भंग करने और कथित 'अनैतिक कृत्य' के गंभीर आरोप में एक बांग्लादेशी नागरिक और महिला को फांसी पर लटका दिया गया था। इस खबर की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि सऊदी अरब की न्याय प्रणाली द्वारा नाबालिग अवस्था में किए गए अपराध पर भी रहम न दिखाने और मृत्युदंड देने की खबरें सामने आ रही हैं। 14 साल की कम उम्र में कथित तौर पर अपराध करने वाले आरोपियों पर भी अदालतें सख्त रुख अपना रही हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संरक्षण और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के मानकों को लेकर बहस तेज हो गई है।

मक्का मस्जिद विवाद: बांग्लादेशी नागरिक का निष्पादन और परिवार के गंभीर आरोप

सऊदी गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार बांग्लादेशी नागरिक नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर (Nazrul Islam Abdul Basir) और सिटी अख्तर (Siti Akhtar) को मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक कृत्य करने के जुर्म में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा दी गई। नजरुल इस्लाम सऊदी अरब में सफाईकर्मी के रूप में कार्य करता था। हालांकि सऊदी अधिकारियों ने इस बात का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया कि घटना का सटीक समय क्या था या उनके खिलाफ जांच किस तरह आयोजित की गई। सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया कि दोनों पति-पत्नी थे और मस्जिद परिसर में माथे पर किस (Kiss) करने या स्नेह जताने के कारण यह कार्रवाई हुई, जबकि बांग्लादेश में पीड़ित परिवार ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज किया है। नजरुल के पिता अब्दुल बशीर, जिन्होंने खुद 24 सालों तक सऊदी में काम किया है, का कहना है कि उनके बेटे को निष्पक्ष कानूनी बचाव का मौका ही नहीं दिया गया और गुप्त तरीके से बिना पूर्व सूचना के फांसी दे दी गई।

14 साल की उम्र में अपराध पर भी नहीं पिघला कानून: नाबालिग न्याय प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

सऊदी अरब के कठोर कानूनी ढांचे में 'ताजीर' (Ta'zir) व्यवस्था के तहत न्यायाधीशों को अपराध की गंभीरता और सजा तय करने का असीमित विवेकाधिकार प्राप्त होता है। यही वजह है कि 14 साल की उम्र में (नाबालिग रहते हुए) किए गए अपराधों के मामलों में भी अदालतें मृत्युदंड सुना रही हैं। मानवाधिकार संगठनों (जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और रिप्राइव) की रिपोर्ट बताती है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों और बाल अधिकारों के समझौतों का उल्लंघन करते हुए सऊदी न्याय व्यवस्था में नाबालिगों को दी जाने वाली मृत्युदंड की प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। जब कोई आरोपी 14 या 16 वर्ष की आयु में किसी घटना से जुड़ता है, तब भी वर्षों जेल में बिताने के बाद बालिग होने पर उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया जाता है, जो विश्व स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।

कानूनी प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर उठते सवाल

बांग्लादेश की सरकार और राजनयिकों ने भी इस पूरी घटना पर अपनी गहरी चिंता जताई है। वियना कन्वेंशन के तहत किसी विदेशी नागरिक को गिरफ्तार करने या सजा देने से पहले संबंधित देश के वाणिज्य दूतावास (Consulate) को सूचित करना अनिवार्य होता है, लेकिन बांग्लादेशी दूतावास को इस निष्पादन से पहले कोई आधिकारिक पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने रियाद से मामले की पूरी फाइल और अदालती निष्पादन के दस्तावेज मांगे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब अभियुक्तों को भाषा की बाधा, वकील की अनुपलब्धता और गुप्त सुनवाई का सामना करना पड़ता है, तो वहां न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पूरी तरह संदिग्ध हो जाती है।

मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया और वैश्विक चिंताएं

एमनेस्टी इंटरनेशनल और कई अंतरराष्ट्रीय वॉचडॉग एजेंसियों ने सऊदी अरब में लगातार बढ़ती फांसी की संख्या पर गहरा दुख जताया है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब में हर साल सैकड़ों लोगों को मृत्युदंड दिया जाता है, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी प्रवासियों और नाबालिग अवस्था में गिरफ्तार किए गए लोगों की होती है। सऊदी अरब के शासकों ने कानूनों में सुधार के कई वादे जरूर किए थे, लेकिन धरातल पर ताजीर कानून का इस्तेमाल न्यायाधीश अपनी इच्छा अनुसार सजा देने के लिए कर रहे हैं। 14 साल की उम्र में किए गए अपराध पर भी रहम न मिलना यह दिखाता है कि मानवाधिकारों के कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने में अभी भी लंबा सफर तय करना बाकी है।

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