ना स्मार्टफोन, ना UPI… फिर भी दिल का करोड़पति निकला पोस्टमास्टर; 2 साल की मासूम के इलाज के लिए दान कर दी पूरी सैलरी

आज का दौर जहां 5G इंटरनेट, डिजिटल वॉलेट्स, सोशल मीडिया के दिखावे और ऑनलाइन पब्लिसिटी के इर्द-गिर्द घूमता है, वहीं हमारे समाज में कुछ ऐसे गुमनाम फरिश्ते भी मौजूद हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के मानवता की सबसे बड़ी इबारत लिख रहे हैं। एक ऐसे ही सीधे-सादे ग्रामीण डाक सेवक (पोस्टमास्टर) ने इंसानियत का वह रूप दिखाया है जिसने लाखों लोगों की आंखों को नम कर दिया है। न उनके हाथ में कोई महंगा स्मार्टफोन है, न ही वे गूगल पे, फोनपे या किसी यूपीआई ऐप का इस्तेमाल करना जानते हैं। जेब में आज भी एक पुराना कीपैड फोन रखने वाले इस साधारण कर्मचारी ने जब एक गरीब परिवार की दो साल की मासूम बच्ची को जिंदगी और मौत के बीच झूलते देखा, तो बिना एक पल गंवाए अपनी गाढ़ी कमाई की पूरी मासिक सैलरी उस बच्ची के इलाज के लिए समर्पित कर दी। इस निस्वार्थ कदम ने यह साबित कर दिया है कि इंसानियत किसी बैंक बैलेंस या डिजिटल तकनीक की मोहताज नहीं होती, असली अमीरी दिल की होती है।

यह पूरा मामला एक बेहद भावुक और दिल दहला देने वाले संघर्ष से जुड़ा है। गांव में रहने वाले एक अत्यंत निर्धन दिहाड़ी मजदूर की दो वर्षीय मासूम बेटी एक गंभीर और दुर्लभ जानलेवा बीमारी से पीड़ित थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि बच्ची के फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र में फैला संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अगर अगले कुछ हफ्तों के भीतर उच्च स्तरीय मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती कराकर महंगी दवाओं और इंजेक्शन का कोर्स शुरू नहीं कराया गया, तो मासूम की जान बचाना नामुमकिन हो जाएगा। इलाज का शुरुआती खर्च ही लाखों में आंका गया था। मजदूर पिता ने अपनी झोपड़ी, बकरियां और पत्नी के चांदी के मामूली गहने तक गिरवी रख दिए, लेकिन फिर भी अस्पताल के खर्च के आगे जुटाई गई रकम नाकाफी साबित हो रही थी। पूरा परिवार अस्पताल के गलियारे में बैठकर अपनी लाडली के लिए आंसुओं के सिवा कुछ नहीं बहा पा रहा था।

उस बच्ची की मां जब रिश्तेदारों से उधार मांगकर मिले कुछ पुराने और मुड़े-तुड़े नोटों का मनीऑर्डर या मेडिकल खाते में जमा कराने के लिए गांव के उप-डाकघर पहुंची, तो काउंटर पर बैठे पोस्टमास्टर ने उस महिला के चेहरे पर छाई बेबसी और आंखों से बहते आंसुओं को भांप लिया। पूछने पर जब मां ने बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट्स और अस्पताल के पर्चे दिखाए, तो पोस्टमास्टर का कलेजा कांप उठा। पोस्टमास्टर खुद बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं, सीमित मानदेय पर परिवार चलाते हैं और उनके पास कोई पैतृक अकूत संपत्ति नहीं है। लेकिन सामने खड़ी एक मां की आंसुओं से भरी पुकार ने उनके भीतर के इंसान को झकझोर दिया। उन्होंने तुरंत स्थानीय डाक अधिकारियों और अपने परिवार से बात किए बिना ही एक ऐतिहासिक और साहसी फैसला ले लिया।

पोस्टमास्टर ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसी दिन अपनी महीने भर की पूरी सैलरी का चेक सीधे उस अस्पताल के नाम काट दिया जहां बच्ची का इलाज होना था। जब डाकघर के अन्य सहकर्मियों और स्थानीय ग्रामीणों ने उनसे पूछा कि वे पूरे महीने अपने घर का राशन और निजी खर्च कैसे चलाएंगे, तो उन्होंने बेहद सादगी से मुस्कुराते हुए जो जवाब दिया, उसने सबका सिर सम्मान से झुका दिया। पोस्टमास्टर ने कहा, “हम तो रूखी-सूखी रोटी और दाल खाकर भी एक महीना गुजार लेंगे, परिवार थोड़ा हाथ खींचकर खर्च चला लेगा। मेरी सैलरी तो अगले महीने फिर खाते में आ जाएगी, लेकिन अगर उस दो साल की फूल जैसी बच्ची की सांसें उखड़ गईं, तो दुनिया की कोई दौलत उसे दोबारा वापस नहीं ला सकेगी।” इस एक वाक्य ने वहां मौजूद हर शख्स को स्तब्ध कर दिया।

यद्यपि उस भले पोस्टमास्टर ने यह नेकी पूरी तरह खामोशी से की थी और वे नहीं चाहते थे कि इसका कोई प्रचार हो, लेकिन अस्पताल के एक युवा डॉक्टर ने जब यह सुना कि एक साधारण कीपैड फोन चलाने वाले बुजुर्ग डाककर्मी ने अपनी पूरी सैलरी इस मासूम के नाम कर दी है, तो उन्होंने इस प्रेरक घटना को सोशल मीडिया पर साझा कर दिया। देखते ही देखते यह खबर पूरे क्षेत्र और इंटरनेट पर जंगल की आग की तरह फैल गई। पोस्टमास्टर के इस अप्रतिम त्याग से प्रेरित होकर लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और विदेशों तक में बैठे सैकड़ों लोगों ने बच्ची के मेडिकल रिलीफ फंड में सीधे डोनेशन भेजना शुरू कर दिया। पोस्टमास्टर की उस एक सैलरी की चिंगारी ने ऐसा जनआंदोलन खड़ा किया कि बच्ची के पूरे इलाज का फंड महज 48 घंटों के भीतर इकट्ठा हो गया और मासूम को समय पर इलाज मिल सका।

आज के भौतिकतावादी युग में जहां लोग चंद रुपयों के लिए अपनों से रिश्ते तोड़ लेते हैं, वहां एक अनजान बच्ची के लिए अपनी खून-पसीने की कमाई न्योछावर कर देना यह अहसास कराता है कि दुनिया में अभी अच्छाई जिंदा है। उस पोस्टमास्टर के पास भले ही क्रेडिट कार्ड, आलीशान कार या महंगे गैजेट्स न हों, लेकिन उनके इस एक कदम ने उन्हें समाज की नजर में किसी भी अरबपति से कहीं ज्यादा बड़ा बना दिया है। स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने भी डाक विभाग के इस जांबाज और संवेदनशील कर्मचारी को सम्मानित करने का निर्णय लिया है। यह कहानी हर उस इंसान के लिए एक आईना है जो यह सोचता है कि दूसरों की मदद करने के लिए बहुत अमीर होना जरूरी है; असल में मदद के लिए सिर्फ एक दयालु और संवेदनशील दिल की जरूरत होती है।

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