डिजिटल लाइब्रेरी और योजनाओं के प्रचार बजट में धांधली का आरोप लगा सीएम योगी से की प्रमुख सचिव और निदेशक को हटाने की मांग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा अपनी बेबाकी और तल्ख तेवरों के लिए सुर्खियों में रहने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और योगी सरकार में पंचायती राज एवं अल्पसंख्यक कल्याण कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर अपनी ही सरकार के प्रशासनिक तंत्र से टकरा गए हैं। इस बार राजभर की नाराजगी किसी विपक्षी दल या राजनीतिक विरोधी से नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उनके अपने ही विभाग के शीर्ष आईएएस अफसरों से है। पंचायती राज विभाग में मंत्री और नौकरशाही के बीच अधिकारों और कार्यप्रणाली को लेकर तनातनी इतनी बढ़ चुकी है कि ओपी राजभर ने विभाग के प्रमुख सचिव और निदेशक के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दरबार में गुहार लगा दी है। मंत्री का खुला आरोप है कि विभागीय अधिकारी उनकी एक भी बात नहीं सुन रहे हैं और उच्च स्तर पर लिए जाने वाले नीतिगत फैसलों को फाइलों में दबाकर ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं।

राजधानी लखनऊ के बापू भवन सचिवालय से लेकर पूर्वांचल के राजनीतिक गलियारों तक इस नए विवाद ने भारी सरगर्मी पैदा कर दी है। उन्नाव, कानपुर, वाराणसी, गाजीपुर, मऊ और बलिया जैसे ग्रामीण अंचलों में पंचायती राज विभाग की योजनाओं के सीधे सरोकार को देखते हुए इस टकराव के व्यापक सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। ओपी राजभर ने मुख्यमंत्री को बाकायदा पत्र लिखकर और व्यक्तिगत रूप से मिलकर विभागीय प्रमुख सचिव अनिल कुमार और पंचायती राज निदेशक अमित कुमार सिंह पर गंभीर लापरवाही और मनमानी के आरोप मढ़े हैं। मंत्री ने दो टूक मांग की है कि इन दोनों अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से पद से हटाया जाए ताकि विभाग में अटके पड़े विकास कार्यों को पटरी पर लाया जा सके। इस टकराव ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में मंत्रियों बनाम नौकरशाही के पुराने विवाद को हवा दे दी है।

डिजिटल लाइब्रेरी और प्रचार बजट में खेल: राजभर ने अफसरों पर लगाए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

पंचायती राज विभाग में मचे इस घमासान की मुख्य जड़ ग्राम पंचायतों में बनने वाली डिजिटल लाइब्रेरी परियोजना और विभागीय योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए आवंटित भारी बजट में कथित धांधली को माना जा रहा है। प्रदेश की ग्राम पंचायतों में ग्रामीण युवाओं और छात्र-छात्राओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी। मंत्री ओम प्रकाश राजभर का आरोप है कि चुनाव और वित्तीय वर्ष की समय-सीमा नजदीक होने के बावजूद अभी तक पहले चरण की डिजिटल लाइब्रेरी का काम भी पूरा नहीं हो सका है। जमीन पर पहले चरण का काम अधूरा पड़ा है और अधिकारी इसे पूरा कराने के बजाय दूसरे चरण के नए टेंडरों को जारी करने में हड़बड़ी दिखा रहे हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया में भारी कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार की बू आ रही है।

इसके साथ ही मंत्री ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया है कि विभाग की जनहितैषी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सरकार से मिलने वाली भारी-भरकम राशि को विभागीय अधिकारी मिलीभगत करके हड़प गए हैं। प्रचार का बजट कागजों पर खर्च दिखा दिया गया, जबकि धरातल पर आम ग्रामीणों को योजनाओं की कोई ठोस जानकारी ही नहीं मिल सकी। राजभर ने खुले शब्दों में कहा कि जब विभागीय समीक्षा बैठकों में वे इन योजनाओं की प्रगति और प्रचार खर्च का हिसाब मांगते हैं, तो अधिकारी कोई स्पष्ट जवाब देने के बजाय टालमटोल करते हैं। इतना ही नहीं, ग्रामीण इलाकों में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन और मल निस्तारण परियोजना (Faecal Sludge Treatment) के क्रियान्वयन में भी अधिकारियों द्वारा भारी लापरवाही बरती जा रही है, जिससे ग्रामीण स्वच्छता मिशन की साख पर बट्टा लग रहा है।

16 डीपीआरओ पर कार्रवाई की फाइल अटकी, फील्ड में मनमानी से आहत हुए मंत्री

विभागीय सूत्रों के अनुसार मंत्री ओम प्रकाश राजभर केवल मुख्यालय के शीर्ष अफसरों से ही नहीं, बल्कि जिलों में तैनात जिला पंचायत राज अधिकारियों (DPRO) की कार्यशैली से भी बेहद क्षुब्ध हैं। राजभर ने विभिन्न जिलों के औचक निरीक्षण और जनशिकायतों के आधार पर 16 दागी डीपीआरओ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और जांच की सिफारिश करते हुए रिपोर्ट मुख्यालय भेजी थी। मंत्री का कहना है कि महीनों बीत जाने के बाद भी विभागीय प्रमुख सचिव और निदेशक स्तर से उन लापरवाह डीपीआरओ पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

फील्ड के अधिकारियों को लगता है कि जब सचिवालय के शीर्ष अफसर ही मंत्री के निर्देशों को दरकिनार कर रहे हैं, तो उन्हें भी मंत्री के आदेशों की परवाह करने की जरूरत नहीं है। इस स्थिति से फील्ड में मंत्री के राजनीतिक और प्रशासनिक प्राधिकार को सीधी चुनौती मिल रही थी। राजभर का कहना है कि वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं, जब वे अपने क्षेत्र और प्रदेश के दौरों पर जाते हैं तो लोग उनसे विकास कार्यों और हैंडपंपों, नालियों, सामुदायिक शौचालयों व पंचायत भवनों के रखरखाव को लेकर सवाल पूछते हैं। ऐसी स्थिति में यदि विभागीय अमला मंत्री की बात ही न सुने और फाइलों को दबाकर बैठा रहे, तो सरकार की जनहितैषी छवि को गहरा नुकसान पहुंचता है।

यूपी में मंत्रियों बनाम अफसरों की पुरानी जंग: आशीष पटेल से लेकर दयाशंकर तक उठा चुके हैं आवाज

उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी कैबिनेट मंत्री या राज्य मंत्री ने अपनी ही सरकार के नौकरशाहों के खिलाफ सार्वजनिक या अंदरूनी तौर पर बगावती तेवर अपनाए हों। योगी सरकार के पिछले और वर्तमान कार्यकाल में मंत्रियों और आईएएस अधिकारियों के बीच अधिकारों के टकराव के कई हाई-प्रोफाइल मामले सामने आ चुके हैं। इससे पहले अपना दल (एस) के कोटे से प्राविधिक शिक्षा मंत्री आशीष पटेल ने भी अपने विभाग के अधिकारियों द्वारा योजनाओं में अड़ंगा लगाने और उनकी बात न सुनने की शिकायत सार्वजनिक मंचों पर दर्ज कराई थी। इसी तरह पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री अनिल राजभर और परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के विभागों में भी अधिकारियों द्वारा मंत्रियों को विश्वास में लिए बिना बड़े पैमाने पर तबादले कर देने और नीतिगत निर्णयों को बाईपास करने के विवाद सामने आए थे।

योगी सरकार के पिछले कार्यकाल में जल शक्ति राज्य मंत्री दिनेश खटीक ने तो अपने विभाग के प्रमुख सचिव पर भ्रष्टाचार और दलित मंत्री होने के कारण उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए अपना त्यागपत्र तक दिल्ली केंद्रीय नेतृत्व को भेज दिया था, जिसके बाद काफी मान-मनौव्वल के बाद मामला शांत हुआ था। ओम प्रकाश राजभर का भी नौकरशाही से पुराना छत्तीस का आंकड़ा रहा है। वर्ष 2017 से 2019 के दौरान भी जब वे पहली बार कैबिनेट मंत्री बने थे, तब भी उन्होंने गाजीपुर के तत्कालीन डीएम और अन्य अधिकारियों के खिलाफ सीधे धरने पर बैठने की चेतावनी दे दी थी। अब एक बार फिर एनडीए में वापसी और कैबिनेट मंत्री बनने के बाद राजभर को उसी प्रशासनिक दीवार का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी राजनीतिक बेचैनी साफ झलक रही है।

सीएम योगी से मुलाकात और आगे की रणनीति: क्या नपेंगे प्रमुख सचिव और निदेशक?

अपनी अनदेखी और विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर ओम प्रकाश राजभर ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के दौरान उन्होंने पूरी स्थिति का कच्चा-चिट्ठा उनके सामने रख दिया है। राजभर ने सीएम से दो टूक कहा है कि यदि विभाग के शीर्ष अधिकारी सरकार की प्राथमिकताओं को लागू करने के बजाय अपनी मनमर्जी चलाएंगे, तो वे एक मूकदर्शक मंत्री बनकर नहीं बैठ सकते। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि या तो इन अधिकारियों का तबादला किसी अन्य विभाग में किया जाए और उनकी जगह काम करने वाले कर्मठ अधिकारियों को तैनाती दी जाए, या फिर वे इस मामले को लेकर आगे कड़े कदम उठाने को विवश होंगे।

दूसरी ओर, इस पूरे विवाद पर पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव अनिल कुमार ने किसी भी तरह की सार्वजनिक बयानबाजी से पूरी तरह दूरी बना रखी है और आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। सचिवालय के गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे मामले को गंभीरता से संज्ञान में लिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ने पंचायती राज विभाग की डिजिटल लाइब्रेरी योजना, प्रचार खर्च और 16 डीपीआरओ के खिलाफ लंबित मामलों की फाइलों की रिपोर्ट तलब की है। माना जा रहा है कि यदि प्रारंभिक जांच में अधिकारियों की स्तर पर लापरवाही या वित्तीय अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं, तो मुख्यमंत्री जल्द ही बड़ा प्रशासनिक फेरबदल कर सकते हैं। आगामी विधानसभा उपचुनावों और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी अपने प्रमुख सहयोगी दल के नेता को लंबे समय तक नाराज रखने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सीएम योगी इस अफसरशाही बनाम मंत्री के शक्ति प्रदर्शन में क्या अंतिम फैसला लेते हैं।

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