
अपने अपरंपरागत डार्क ह्यूमर और सनसनीखेज टैलेंट शो ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के जरिए इंटरनेट की दुनिया में तहलका मचाने वाले मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन और डिजिटल क्रिएटर समय रैना ने यूट्यूब के ताजा तकनीकी अपडेट और मोनेटाइजेशन नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। डिजिटल स्पेस पर करोड़ों दर्शकों का ध्यान खींचने और हर एपिसोड पर लाखों-करोड़ों व्यूज हासिल करने के बावजूद समय रैना ने वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म की नई व्यवस्था को पूरी तरह निराशाजनक और क्रिएटर्स के साथ ‘धोखा’ करार दिया है। सोशल मीडिया पर अपने खास व्यंग्यात्मक और बेबाक अंदाज में भड़ास निकालते हुए समय रैना ने साफ शब्दों में कहा कि यूट्यूब का नया सिस्टम ‘सब बकवास’ है और मौजूदा दौर में 100 मिलियन व्यूज हासिल करने का भी कोई वास्तविक मूल्य या मतलब नहीं रह गया है।
समय रैना का यह तीखा बयान ऐसे समय में आया है जब देश भर के लाखों स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स यूट्यूब के घटते रेवेन्यू, अप्रत्याशित कम्युनिटी गाइडलाइंस और ऑटोमेटेड एआई मॉडरेशन से पहले से ही हलकान हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, उन्नाव, प्रयागराज, वाराणसी और नोएडा जैसे शहरों में डिजिटल कंटेंट निर्माण को करियर के रूप में चुनने वाले हजारों युवा क्रिएटर्स के बीच भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। स्वतंत्र यूट्यूबर्स का आरोप है कि प्लेटफॉर्म अब केवल बड़े कॉर्पोरेट्स और पारिवारिक विज्ञापनों को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि अपनी मेहनत और भारी वित्तीय जोखिम उठाकर ऑरिजिनल कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स को ‘येलो डॉलर’ (डिमॉनेटाइजेशन) और व्यूज कट की मार झेलनी पड़ रही है। समय रैना द्वारा सार्वजनिक रूप से उठाई गई इस आवाज ने भारतीय क्रिएटर इकोनॉमी के उस छिपे हुए दर्द को उजागर कर दिया है, जिस पर अब तक पर्दा पड़ा हुआ था।
100 मिलियन व्यूज और कमाई शून्य: यूट्यूब के नए एल्गोरिदम और रेवेन्यू मॉडल पर क्यों भड़के समय रैना?
समय रैना का मुख्य गुस्सा यूट्यूब द्वारा हाल ही में लागू किए गए व्यू-काउंटिंग और विज्ञापन राजस्व वितरण (RPM/CPM) के नए एल्गोरिदम को लेकर है। समय रैना के शो ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के हर एपिसोड को 20 मिलियन से 50 मिलियन तक व्यूज मिलते हैं और उनकी कुल डिजिटल पहुंच 100 मिलियन का आंकड़ा आसानी से पार कर जाती है। लेकिन कॉमेडियन का आरोप है कि यूट्यूब का नया एआई एल्गोरिदम जैसे ही वीडियो में कोई बोल्ड जोक, व्यंग्य या अनफिल्टर्ड भाषा पकड़ता है, वह तुरंत वीडियो को ‘एडवर्टाइजर फ्रेंडली’ सूची से बाहर कर उस पर पीला डॉलर (डि-मोनेटाइजेशन) लगा देता है।
समय रैना ने दर्द बयां करते हुए कहा कि एक बड़े स्तर के रियलिटी शो को तैयार करने में लाखों रुपये का प्रोडक्शन खर्च आता है। इसमें हाई-एंड 4K कैमरे, विशाल ऑडिटोरियम का किराया, विशाल टेक्निकल टीम की सैलरी, साउंड डिजाइनिंग और सेलिब्रिटी जजों को बुलाने की लॉजिस्टिक्स लागत शामिल होती है। जब एक क्रिएटर अपने दम पर महीनों की मेहनत के बाद ऐसा वीडियो तैयार करता है जो 100 मिलियन लोगों तक पहुंचता है, तो प्लेटफॉर्म उसे राजस्व का उचित हिस्सा देने के बजाय उसके वीडियो को फ्लैग कर देता है। उन्होंने कहा कि अगर 100 मिलियन व्यूज आने के बाद भी क्रिएटर अपने प्रोडक्शन का खर्च नहीं निकाल पा रहा है, तो उस विशाल व्यूअरशिप का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह जाता। यह सिस्टम सिर्फ देखने में बड़ा लगता है, लेकिन अंदर से खोखला हो चुका है।
एडवर्टाइजर फ्रेंडली गाइडलाइंस और ‘येलो डॉलर’ का खौफ: भारतीय क्रिएटर्स के सामने गहराया आजीविका संकट
यूट्यूब की वैश्विक नीतियों में हाल के दिनों में विज्ञापनों की सुरक्षा (ब्रांड सेफ्टी) को लेकर भारी सख्ती बरती गई है। अंतरराष्ट्रीय विज्ञापनदाताओं के दबाव में यूट्यूब ने अपनी ऑटोमेटेड मशीन लर्निंग प्रणाली को इतना संवेदनशील बना दिया है कि वह किसी भी अनौपचारिक बोलचाल, हल्के गाली-गलौज, डार्क सटायर या राजनीतिक चुटकुलों को सीधे ‘असुरक्षित सामग्री’ (Unsafe Content) की श्रेणी में डाल देता है। इसके चलते वीडियो भले ही ट्रेंडिंग में नंबर एक पर चल रहा हो, लेकिन उस पर चलने वाले विज्ञापनों की संख्या लगभग शून्य कर दी जाती है।
भारतीय कॉमेडी सीन से जुड़े कई अन्य प्रमुख कलाकारों ने भी समय रैना के इस रुख का पुरजोर समर्थन किया है। तन्मय भट्ट, समय के सह-कलाकार और स्टैंडअप इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यूट्यूब अब स्वतंत्र और लीक से हटकर सोचने वाले कलाकारों के लिए एक बेहद घुटन भरा मंच बनता जा रहा है। यदि कोई क्रिएटर पूरी तरह से सेंसर किया हुआ, फ्लैट और बिना किसी धार वाला कंटेंट बनाएगा, तो ही उसे विज्ञापन मिलेंगे। लेकिन दर्शक इंटरनेट पर टीवी जैसी घिसी-पिटी सामग्री देखने नहीं आते; वे कच्चा, बेबाक और यथार्थवादी मनोरंजन चाहते हैं। इस विरोधाभास ने क्रिएटर्स को ऐसी दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां दर्शकों का प्यार तो मिलता है, लेकिन प्लेटफॉर्म से मिलने वाली आजीविका छिन जाती है।
डिजिटल क्रिएटर्स बनाम प्लेटफॉर्म की मनमानी: क्या स्पॉन्सरशिप और लाइव शोज ही बचेंगे आखिरी सहारा?
इस तकनीकी संकट का सीधा असर केवल मुंबई या दिल्ली के स्थापित सितारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों से उभर रहे नए डिजिटल रचनाकारों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। कानपुर, उन्नाव और अवध क्षेत्र के स्थानीय रोस्टर्स, व्लॉगर्स और पॉडकास्टर्स जो अपनी स्थानीय बोली और मुहावरों में कंटेंट बनाते हैं, वे भी लगातार यूट्यूब के इस ऑटोमेटेड सेंसरशिप का शिकार हो रहे हैं। कई स्थानीय यूट्यूबर्स का कहना है कि बिना किसी मानवीय समीक्षा के उनके महीनों पुराने वीडियोज को एक झटके में डिमॉनेटाइज कर दिया जाता है और अपील करने पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता।
समय रैना के इस विस्फोट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक डिजिटल क्रिएटर अब केवल प्लेटफॉर्म के एड-रेवेन्यू (Google AdSense) पर निर्भर नहीं रह सकते। इस संकट से पार पाने के लिए क्रिएटर्स अब तीसरे पक्ष के डायरेक्ट ब्रांड स्पॉन्सरशिप, मर्चेंडाइज बिक्री, यूट्यूब चैनल मेंबरशिप और लाइव टिकटेड शोज की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं। समय रैना खुद भी अपने लाइव टूर और पर्सनल स्पॉन्सरशिप के जरिए अपने शो को फंड करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि जो नए और उभरते हुए कलाकार हैं, जिनके पास बड़े ब्रैंड्स का सीधा संपर्क नहीं है, वे यूट्यूब की इस मनमानी नीति के चलते शुरुआत में ही दम तोड़ देंगे।
यूट्यूब के नए अपडेट पर समय रैना का यह कड़ा ऐतराज सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म्स पर ट्रेंड कर रहा है। नेटिजन्स और कंटेंट क्रिएटर्स का एक बड़ा वर्ग अब यूट्यूब से अपनी मोनेटाइजेशन पॉलिसियों और एआई मॉडरेशन सिस्टम में सुधार करने की मांग कर रहा है। यदि प्लेटफॉर्म ने रचनात्मक अभिव्यक्ति और विज्ञापन सुरक्षा के बीच एक संतुलित रास्ता नहीं निकाला, तो आने वाले समय में देश के शीर्ष डिजिटल क्रिएटर्स यूट्यूब छोड़कर वैकल्पिक पेड प्लेटफॉर्म्स या अपने स्वतंत्र ऐप्स की तरफ पलायन करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। समय रैना की इस खुली बगावत ने कम से कम यह बहस तो छेड़ ही दी है कि क्या किसी क्रिएटर की सफलता केवल स्क्रीन पर दिखने वाले ‘करोड़ों व्यूज’ से आंकी जा सकती है या उस सफलता के पीछे का आर्थिक सच कुछ और ही बयां करता है।
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