
दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक गलियारे 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को लेकर जारी भू-राजनीतिक टकराव अब एक खतरनाक मुहाने पर पहुंच गया है। वाशिंगटन की ओर से तनाव घटाने और जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल करने के लिए भेजे गए कूटनीतिक जवाब को ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया है। तेहरान ने अमेरिकी प्रस्ताव को पूरी तरह 'अस्पष्ट और नाकाफी' बताते हुए स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि वह अब इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक बातचीत के मूड में नहीं है। ईरान के इस आक्रामक और कड़े रुख के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। पिछले कई हफ्तों से बंद पड़े या भारी सैन्य निगरानी में चल रहे इस समुद्री मार्ग को लेकर उम्मीद की जा रही थी कि दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत से कोई मध्यमार्ग निकल आएगा, लेकिन ईरान के ताजा ऐलान ने शांति की सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
दुनिया की 'ऑयल लाइफलाइन': क्यों इतना अहम है होर्मुज का संकरा जलमार्ग
होर्मुज जलडमरूमध्य केवल पानी का एक संकरा रास्ता नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की मुख्य जीवनरेखा (Choke Point) माना जाता है। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है।
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वैश्विक तेल आपूर्ति का केंद्र: दुनिया भर में समुद्र के रास्ते होने वाले कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20 से 21 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे मार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल व प्राकृतिक गैस निर्यातक देश अपने जहाजों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक भेजने के लिए पूरी तरह इसी रूट पर निर्भर हैं।
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रणनीतिक बढ़त: इस जलमार्ग के उत्तरी हिस्से पर ईरान का सीधा भौगोलिक और सैन्य नियंत्रण है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना स्पीड बोट्स, सबमरीन, एंटी-शिप मिसाइलों और सी-माइंस के जरिए इस पूरे इलाके पर नजर रखती है।
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व्यापारिक गतिरोध का असर: इस जलमार्ग पर जरा सा भी तनाव आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें आसमान छूने लगती हैं और वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई (Freight Rates) व जहाजों का बीमा खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
अमेरिका का प्रस्ताव और ईरान की नाराजगी: आखिर कहां फंसा है असली पेंच?
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने तीसरे पक्ष के माध्यम से तेहरान को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें जलमार्ग से सैन्य तनाव घटाने, व्यापारिक टैंकरों की सुरक्षा की गारंटी देने और बदले में कुछ गैर-महत्वपूर्ण प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही गई थी। लेकिन ईरान का रुख शुरुआत से ही बिल्कुल स्पष्ट रहा है:
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प्रतिबंधों पर ठोस गारंटी की मांग: ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका उसके ऊर्जा क्षेत्र, बैंकिंग नेटवर्क और तेल निर्यात पर लगे सभी कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को औपचारिक रूप से नहीं हटाता, तब तक समुद्री सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता। तेहरान ने अमेरिका के 'सशर्त ढील' वाले प्रस्ताव को एक कूटनीतिक छलावा करार दिया है।
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सैन्य उपस्थिति पर ऐतराज: फारस की खाड़ी और अरब सागर में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े (US Fifth Fleet) और पश्चिमी युद्धपोतों के भारी जमावड़े को ईरान अपनी संप्रभुता के लिए सीधा खतरा मानता है। ईरान का तर्क है कि इस इलाके की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय खाड़ी देशों की जिम्मेदारी है और पश्चिमी शक्तियों को तुरंत यह क्षेत्र खाली करना होगा।
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विश्वास की भारी कमी: ईरान के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि अमेरिका कूटनीतिक वार्ताओं का इस्तेमाल केवल समय बिताने और अपनी सैन्य तैनाती को मजबूत करने के लिए कर रहा है। इसी कारण ईरानी विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि खाली वादों के आधार पर टेबल पर बैठने का दौर अब खत्म हो चुका है।
वैश्विक बाजारों में खलबली: भारत सहित दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
ईरान द्वारा बातचीत के रास्ते बंद करने की घोषणा का तुरंत असर वैश्विक वित्तीय और कमोडिटी बाजारों पर दिखने लगा है:
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क्रूड ऑयल में तेज उछाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का रुख बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गतिरोध लंबा खिंचा या फारस की खाड़ी में किसी टैंकर पर हमला हुआ, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती हैं।
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एलएनजी (LNG) सप्लाई पर खतरा: कतर से एशियाई और यूरोपीय देशों को होने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस की बड़ी खेप इसी रास्ते से जाती है। सर्दियों के मौसम या बढ़ती बिजली मांग के बीच एलएनजी का संकट बिजली संकट को जन्म दे सकता है।
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भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा दबाव: भारत अपनी घरेलू कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि होर्मुज मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध होता है, तो भारत के लिए तेल ढुलाई का समय और लागत दोनों बढ़ जाएंगे, जिसका सीधा असर देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है।
सैन्य टकराव या कूटनीतिक दबाव: आगे किस दिशा में जा सकता है संकट?
ईरान के इस सख्त रुख के बाद गेंद अब अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के पाले में है। वाशिंगटन पर अपने खाड़ी सहयोगी देशों की ओर से दबाव है कि वह व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक एस्कॉर्ट मिशन को और तेज करे। हालांकि, विशेषज्ञों की राय है कि इस संकरे जलमार्ग में कोई भी छोटी सी सैन्य चूक या गलतफहमी पूर्ण युद्ध का रूप ले सकती है, जिसे झेलने की स्थिति में इस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था बिल्कुल नहीं है। दूसरी ओर, चीन और अन्य प्रमुख आयातक देश जो ईरान और खाड़ी देशों दोनों से जुड़े हुए हैं, वे पर्दे के पीछे से तनाव को काबू में करने की कोशिशों में जुट गए हैं। फिलहाल, तेहरान के अड़ियल रुख ने यह साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों और अपनी सैन्य नीतियों पर कोई बड़ा व ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य का यह रणनीतिक ताला खुलना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है।
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