लाहौर में यौन हिंसा का खौफनाक आंकड़ा! 8 महीने में 498 रेप, 36 गैंगरेप और 1108 यौन अपराध; पंजाब पुलिस की रिपोर्ट से पाकिस्तान में हड़कंप

 पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की राजधानी और देश के दूसरे सबसे बड़े सांस्कृतिक शहर लाहौर में महिलाओं और मासूम बच्चों के खिलाफ बढ़ रहे जघन्य अपराधों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। पंजाब पुलिस और अपराध शाखा द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों ने शहर में कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक दावों की पूरी तरह पोल खोल दी है। जारी की गई चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, चालू वर्ष के शुरुआती आठ महीनों (जनवरी से अगस्त) के भीतर अकेले लाहौर महानगर में महिलाओं के खिलाफ गंभीर यौन हिंसा और उत्पीड़न के कुल 1,108 मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए हैं। इनमें से 498 मामलों में महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार (Rape) की पुष्टि हुई है, जबकि 36 मामलों में सामूहिक दुष्कर्म (Gangrape) जैसी रूह कंपा देने वाली वारदातें सामने आई हैं। ऐतिहासिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र कहे जाने वाले लाहौर में अपराध के इस विस्फोटक आंकड़े ने मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायपालिका की नींद उड़ा दी है।

लाहौर में अपराध का खौफनाक ग्राफ: हर दिन दो से ज्यादा महिलाएं बन रहीं शिकार

आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड्स का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि लाहौर की सड़कों, कार्यस्थलों और यहां तक कि घरों की चारदीवारी के भीतर भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। आठ महीनों में दर्ज हुए 1,108 मामलों का औसत निकाला जाए तो शहर में औसतन हर 5 घंटे में एक महिला या किशोरी किसी न किसी प्रकार के गंभीर यौन अपराध की शिकार हो रही है। वहीं बलात्कार के 498 दर्ज मामलों के आधार पर प्रतिदिन औसतन दो से अधिक महिलाओं के साथ दरिंदगी की जा रही है। 36 गैंगरेप के मामलों ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों के भीतर पुलिस और सख्त कानूनों का कोई भय शेष नहीं बचा है। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि दर्ज मामलों के अलावा सैकड़ों ऐसी घटनाएं भी हैं जो सामाजिक लोक-लाज, पीड़ित परिवारों पर पड़ने वाले दबाव और पुलिस की संवेदनहीन कार्यशैली के डर से कभी थानों की चौखट तक पहुंच ही नहीं पातीं।

शहर के इन संभागों में सबसे अधिक वारदातें: कैंट और मॉडल टाउन भी अछूते नहीं

पुलिस द्वारा संभागवार (Divisional) जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, लाहौर के लगभग सभी छह प्रमुख पुलिस डिवीजन इस गंभीर समस्या की चपेट में हैं। कैंट डिवीजन, मॉडल टाउन, सिटी डिवीजन और सदर संभाग में यौन अपराधों और अपहरण के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। घनी आबादी वाले मध्यमवर्गीय इलाकों से लेकर पॉश रिहायशी सोसायटियों और आउटर हाईवे कॉरिडोर तक अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। आंकड़ों के मुताबिक, दुष्कर्म और छेड़छाड़ के अलावा महिलाओं के अपहरण (Kidnapping) और जबरन बंधक बनाने की 2,500 से अधिक शिकायतें भी इन्हीं आठ महीनों में दर्ज हुई हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा बाद में यौन शोषण और जबरन निकाह के मामलों में तब्दील हो जाता है। पुलिस का कहना है कि दर्ज 1,108 मामलों में से अधिकांश में आरोपियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कर ली गई है, लेकिन चार्जशीट दाखिल करने और त्वरित ट्रायल की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है।

दोषसिद्धि दर में भारी गिरावट: कानून के शिकंजे से क्यों बच निकलते हैं दरिंदे?

पाकिस्तान में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में सबसे बड़ी विफलता वहां की न्याय प्रणाली और दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) में देखने को मिलती है। कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार आयोग (HRCP) की रिपोर्टों के अनुसार, देश में बलात्कार के मामलों में आरोपियों को सजा मिलने की दर मात्र 1 से 2.5 प्रतिशत के बीच सिमटी हुई है। इसका मुख्य कारण प्राथमिक जांच में होने वाली भारी खामियां हैं:

  1. फोरेंसिक और मेडिकल जांच में देरी: घटना के बाद कई थानों में पीड़ित महिलाओं की समय पर मेडिकल जांच और डीएनए सैंपलिंग नहीं हो पाती, जिससे साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं।

  2. गवाहों की सुरक्षा का अभाव: शक्तिशाली और रसूखदार आरोपियों के खिलाफ गवाही देने वाले प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित परिवारों को सुरक्षा न मिलने के कारण वे समझौते के लिए मजबूर हो जाते हैं।

  3. वकीलों और अदालतों में तारीखों का लंबा दौर: विशेष एंटी-रेप अदालतों के गठन के बावजूद मुकदमों की सुनवाई वर्षों तक खिंचती रहती है, जिससे न्याय की उम्मीद दम तोड़ देती है।

पंजाब सरकार और मानवाधिकार संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया

लाहौर पुलिस के इन खौफनाक आंकड़ों के सार्वजनिक होते ही पंजाब प्रांतीय असेंबली और नेशनल असेंबली में हंगामा खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों और महिला अधिकार संगठनों ने प्रांतीय सरकार और पुलिस महानिदेशक (IGP) के खिलाफ कड़ा मोर्चा खोल दिया है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार द्वारा शुरू किए गए 'महिला सुरक्षा ऐप' (Women Safety App) और पिंक पेट्रोलिंग स्क्वॉड केवल कागजों और जनसंपर्क अभियानों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी हकीकत में सड़कों पर पुलिस की मौजूदगी नगण्य है। ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पाकिस्तान सरकार से अपील की है कि वह यौन अपराधों के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए और त्वरित अदालतों के जरिए फास्ट-ट्रैक फैसले सुनिश्चित करे ताकि अपराधियों के मन में कड़ा कानूनी डर पैदा हो सके।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी और सुधारों की तत्काल दरकार

संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) और वैश्विक संस्थाओं द्वारा जारी महिला शांति और सुरक्षा सूचकांक में पाकिस्तान पहले ही दुनिया के सबसे निचले पायदानों पर शुमार है। लाहौर जैसे प्रमुख महानगर में 8 महीने के भीतर 498 बलात्कार और 36 सामूहिक दुष्कर्म के आंकड़े ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान की छवि को और गहरा आघात पहुंचाया है। विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि जब तक पुलिस विभाग में जांच अधिकारियों को आधुनिक वैज्ञानिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, पीड़ित महिलाओं को समाज और कानूनी प्रक्रिया से गरिमापूर्ण संरक्षण नहीं मिलेगा और अपराधियों को समयबद्ध तरीके से फांसी या आजीवन कारावास की सजा नहीं होगी, तब तक कानून की किताबों में लिखे कड़े प्रावधान इन वहशी दरिंदों को रोकने में नाकाम ही साबित होंगे।

 

Check Also

MP OBC Reservation: एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राज्य में नहीं लागू होगा 27% ओबीसी आरक्षण; 14% कोटा रहेगा बहाल

मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर पिछले कई वर्षों से चल …