
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और कूटनीति के गलियारों में उस वक्त बहुत बड़ा भूचाल आ गया जब विश्व बैंक (World Bank) की एक नवीनतम और बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में पाकिस्तान को पारंपरिक रूप से 'दक्षिण एशिया' (South Asia) क्षेत्रीय समूह से बाहर कर दिया गया है। विश्व बैंक के इस बड़े प्रशासनिक और भौगोलिक वर्गीकरण के बाद से ही पूरी दुनिया के आर्थिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं, जबकि पाकिस्तान के भीतर हड़कंप मच गया है। पड़ोसी मुल्क की मीडिया और वहां के हुक्मरान इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक जीत के रूप में देख रहे हैं, जिसके चलते पाकिस्तानी खेमे में भारी बौखलाहट और निराशा साफ तौर पर देखी जा सकती है। आर्थिक बदहाली और वैश्विक स्तर पर लगातार अलग-थलग पड़ रहे पाकिस्तान के लिए यह फैसला किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि इससे उसकी क्षेत्रीय पहचान और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय साख को गहरा धक्का लगा है।
विश्व बैंक के नए क्षेत्रीय वर्गीकरण का सच और पाकिस्तान का मिडिल ईस्ट में शिफ्ट होना
आखिर ऐसा क्या हुआ कि दशकों से दक्षिण एशिया का हिस्सा रहे पाकिस्तान को अचानक विश्व बैंक की सूचियों में दूसरी जगह देखनी पड़ी? आर्थिक मामलों के जानकारों और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व बैंक ने हाल ही में अपने क्षेत्रीय डेटा और आर्थिक विश्लेषण के मॉडलों में कुछ संरचनात्मक बदलाव किए हैं। इन बदलावों के तहत पाकिस्तान को अब दक्षिण एशिया क्षेत्र से हटाकर पश्चिम एशिया या मध्य पूर्व (Middle East and North Africa – MENA) से जुड़े वित्तीय और प्रशासनिक तंत्र के साथ जोड़ा गया है। इसके पीछे मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि पाकिस्तान पिछले कई दशकों से अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए मुख्य रूप से खाड़ी देशों (Gulf Countries), सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से मिलने वाले कर्ज, बेलआउट पैकेज और तेल सहायता पर ही पूरी तरह निर्भर रहा है। उसकी कुल आर्थिक गतिविधियां और वित्तीय लेन-देन अब दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका) के मुकाबले मध्य पूर्व के देशों के साथ ज्यादा मेल खाते हैं।
भारत की कूटनीतिक और आर्थिक जीत: दक्षिण एशिया में भारत का बढ़ा हुआ दबदबा
पाकिस्तान के विश्लेषक और वहां के राजनीतिक टिप्पणीकार इस फैसले को भारत की एक शानदार और सुनियोजित कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। उनका मानना है कि भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, दुनिया में तेजी से उभरती महाशक्ति की छवि और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में उसके बढ़ते आर्थिक व रणनीतिक प्रभुत्व के आगे अब वैश्विक वित्तीय संस्थाएं भी मजबूर हो गई हैं। भारत की अगुवाई वाला दक्षिण एशिया क्षेत्र अब एक सुदृढ़ विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है, जबकि पाकिस्तान अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था, भारी-भरकम कर्ज और आतंकवाद के दलदल में फंसकर इस समूह के विकास मानकों से काफी पीछे छूट चुका है। विश्व बैंक के इस वर्गीकरण से कूटनीतिक स्तर पर यह संदेश साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब पाकिस्तान को दक्षिण एशिया की मुख्य विकास धारा का हिस्सा नहीं मानता है, जो भारत के लंबे समय से चल रहे उस कूटनीतिक रुख की जीत है जिसमें कहा जाता रहा है कि आतंकवाद और आर्थिक तरक्की एक साथ नहीं चल सकते।
बौखलाए पाकिस्तानी नीति-निर्माता: घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय साख पर बड़ा संकट
विश्व बैंक द्वारा दक्षिण एशिया से बाहर किए जाने की खबर जैसे ही इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हुक्मरानों तक पहुंची, वहां की मीडिया और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं का सैलाब आ गया। पाकिस्तानी राजनेता और अर्थशास्त्री इस बात से बेहद खफा हैं कि उनके देश की पारंपरिक भौगोलिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह से बदल दिया गया है। उनका कहना है कि यह फैसला पाकिस्तान की रही-सही अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को और अधिक धूमिल करेगा। पहले ही देश की जनता महंगाई, आईएमएफ की कड़ी शर्तों और कंगाली से जूझ रही है, ऐसे में वैश्विक मंचों पर इस प्रकार का डिमोशन पाकिस्तान के आम नागरिकों और निवेशकों के बीच भारी निराशा पैदा कर रहा है। पाकिस्तानी मीडिया में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव ने पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया है कि वे पाकिस्तान को दक्षिण एशिया से अलग-थलग कर दें।
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव और भविष्य की तस्वीर
विश्व बैंक के इस अहम फैसले के आने वाले समय में दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर बहुत गहरे और दूरगामी प्रभाव पड़ने तय हैं। एक तरफ जहां दक्षिण एशिया अब पूरी तरह से भारत की केंद्रीय आर्थिक धुरी के इर्द-गिर्द अधिक तेजी से एकीकृत और विकसित हो सकेगा, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान को अपनी पहचान बचाने के लिए पूरी तरह से खाड़ी देशों के रहमो-करम पर निर्भर रहना होगा। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि वैश्विक आर्थिक मंचों पर केवल खोखले दावों से काम नहीं चलता, बल्कि इसके लिए देश की आर्थिक सेहत, राजनीतिक स्थिरता और शांति का माहौल होना सबसे जरूरी है। भारत के लिए यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी नैतिक और रणनीतिक जीत है, जो यह दर्शाती है कि दुनिया अब भारत के नेतृत्व वाले क्षेत्र को एक जिम्मेदार और उभरती हुई आर्थिक ताकत के रूप में देखती है।
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