
पश्चिम बंगाल के औद्योगिक और आर्थिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। राज्य में औद्योगिकीकरण की राह में वर्षों से सबसे बड़ी बाधा रही ‘भूमि अधिग्रहण नीति’ को लेकर सरकार ने नए और व्यावहारिक फॉर्मूले को मंजूरी दी है। नई व्यवस्था के तहत राज्य सरकार उद्योगों के लिए किसी भी किसान या जमीन मालिक की जमीन का जबरन अधिग्रहण (Forced Acquisition) नहीं करेगी, बल्कि सीधे पारदर्शी बातचीत के जरिए जमीन मालिकों से बाजार दरों पर जमीन खरीदेगी। खरीदे गए इन भूखंडों को जोड़कर राज्यभर में एक विशाल, प्रमाणित और पारदर्शी ‘लैंड बैंक’ (Land Bank) तैयार किया जाएगा। पश्चिम बंगाल का इतिहास गवाह है कि सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों के बाद से राज्य में जमीन अधिग्रहण एक बेहद संवेदनशील, राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया था। लेकिन अब सरकार द्वारा उद्योगपतियों और किसानों के बीच मध्यस्थ बनकर खुद जमीन खरीदने के इस नए मॉडल से जहां एक ओर जमीन मालिकों को उनकी संपत्ति का सही और तत्काल मुआवजा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर घरेलू व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कारखाने लगाने के लिए कानूनी रूप से सुरक्षित, विवाद-मुक्त और तैयार जमीन उपलब्ध हो सकेगी।
पश्चिम बंगाल की नई औद्योगिक व निवेश नीति में स्पष्ट किया गया है कि राज्य में अब कभी भी भूमि अधिग्रहण के लिए पुलिस बल या दबाव की रणनीति का इस्तेमाल नहीं होगा। अतीत में तत्कालीन सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत किसानों की अनिच्छा के बावजूद जमीनें अधिग्रहित की जाती थीं, जिसके चलते हिंसक टकराव और कानूनी मुकदमेबाजी पैदा होती थी। इसके बाद एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब सरकार ने उद्योग के लिए जमीन जुटाने से पूरी तरह हाथ खींच लिया, जिसका खामियाजा राज्य के औद्योगिक विकास और युवाओं के रोजगार को भुगतना पड़ा। नई नीति इन दोनों अतिवादी रास्तों के बीच एक संतुलित समाधान प्रस्तुत करती है। इसमें सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह न तो लाठी-गोली चलाएगी और न ही उद्योगपतियों को सीधे किसानों के साथ जमीन सौदेबाजी के लिए अकेला छोड़ेगी। इसके बजाय प्रशासन खुद जमीन मालिकों के साथ टेबल पर बैठकर ‘सहमति आधारित सीधी खरीद’ (Direct Purchase) करेगा, जिससे बिचौलियों और स्थानीय सिंडिकेट्स की मनमानी पर पूरी तरह लगाम लगेगी।
राज्य में उद्योगों के लिए सबसे बड़ी जमीनी चुनौती यह रही है कि यहां बड़े भूखंड एक साथ उपलब्ध नहीं होते, बल्कि जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित है। इस समस्या से निपटने के लिए नई नीति में ‘लैंड पूलिंग’ (Land Pooling) और कंसॉलिडेशन की व्यवस्था जोड़ी गई है। इसके अंतर्गत छोटे-छोटे भूखंडों को मिलाकर एक एकीकृत बड़ा इंडस्ट्रियल प्लॉट तैयार किया जाएगा। इसके अतिरिक्त जमीन के गैर-जिम्मेदाराना उपयोग और लैंड होल्डिंग रोकने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। नीति के तहत यदि कोई कंपनी या निवेशक लैंड बैंक से रियायती या अधिग्रहित जमीन लेता है, तो उसे जमीन आवंटन के अधिकतम 3 वर्षों के भीतर कारखाने में वाणिज्यिक उत्पादन (Commercial Production) शुरू करना अनिवार्य होगा। यदि तय समय सीमा के भीतर जमीन पर काम शुरू नहीं होता है, तो सरकार को उस जमीन को वापस अपने अधिकार में लेने का पूरा कानूनी अधिकार होगा, ताकि जमीन का दुरुपयोग न हो और केवल वास्तविक रोजगार पैदा करने वाले उद्योग ही फल-फूल सकें।
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार केवल जमीन खरीदेगी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण लैंड बैंक का आधुनिक जीआईएस (GIS-based Inventory) आधारित डिजिटल नक्शा तैयार करेगी। इस व्यवस्था के तहत कोई भी निवेशक दुनिया के किसी भी कोने से बैठकर ऑनलाइन सिंगल विंडो पोर्टल के जरिए यह देख सकेगा कि राज्य के किस जिले, सब-डिवीजन या इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में कितनी जमीन उपलब्ध है, वहां बिजली-पानी की क्या स्थिति है और नजदीकी नेशनल हाईवे या पोर्ट से कनेक्टिविटी कैसी है। आवेदन जमा करने के बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर लेटर ऑफ इंटेंट (Letter of Intent) और जमीन का अलॉटमेंट डिजिटल माध्यम से किया जाएगा। इससे वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने और लालफीताशाही से मुक्ति मिलेगी। नीति में खासतौर पर ब्राउनफील्ड री-डेवलपमेंट यानी बंद पड़ी पुरानी मिलों और कारखानों की अप्रयुक्त जमीन को दोबारा उपयोग में लाने को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
राज्य सरकार का लक्ष्य इस नए लैंड बैंक और निवेश प्रोत्साहन नीति के दम पर अगले कुछ वर्षों में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नया निजी निवेश आकर्षित करना है। सरकार ने विशेष ‘थ्रस्ट सेक्टर्स’ (Thrust Sectors) की पहचान की है, जिनमें सेमीकंडक्टर व इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और बैटरी निर्माण, रक्षा उपकरण, जैव प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, स्पेशलिटी स्टील और लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। इन उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में कारखाने लगाने वाले निवेशकों को प्लांट और मशीनरी में किए गए निवेश पर 100% से लेकर 120% तक की वित्तीय सहायता, बिजली शुल्क में छूट और ब्याज सब्सिडी दी जाएगी। साथ ही महिलाओं और ट्रांसजेंडर कामगारों को रोजगार देने वाली एमएसएमई (MSME) इकाइयों के लिए ईपीएफ (EPF) अंशदान में 100% तक की प्रतिपूर्ति का अनूठा प्रावधान भी किया गया है।
सीधी खरीद के इस नए मॉडल से जमीन मालिकों और स्थानीय ग्रामीणों को कई स्तरों पर ठोस आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे पहले, जमीन का मुआवजा किसी पुराने सरकारी सर्कल रेट पर नहीं, बल्कि वर्तमान बाजार मूल्य और केंद्रीय भूमि अधिग्रहण (LARR Act) के कल्याणकारी मानकों को ध्यान में रखकर सीधे बैंक खाते में दिया जाएगा। दूसरा, जमीन की बिक्री पूरी तरह स्वैच्छिक होगी, यानी जो किसान अपनी मर्जी से बेचना चाहेंगे, केवल उन्हीं की जमीन ली जाएगी। तीसरा, तैयार होने वाले औद्योगिक पार्कों में स्थानीय युवाओं के लिए कौशल विकास केंद्र और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। कोलकाता, दुर्गापुर, आसनसोल, सिलीगुड़ी, खड़गपुर और हल्दिया जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्रों के आसपास नए लैंड बैंक विकसित होने से पूरे राज्य की ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलेगी, जिससे पश्चिम बंगाल एक बार फिर देश के अग्रणी विनिर्माण और रोजगार सृजन हब के रूप में स्थापित हो सकेगा।
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