
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और विस्तार की मांग लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूंज रही है। एक तरफ जहां भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4 देश) यूएनएससी में स्थायी सदस्यता के लिए पुरजोर तरीके से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ देशों का एक गुप्त और प्रभावी समूह लगातार इस विस्तार का विरोध कर रहा है। इस समूह को दुनिया 'कॉफी क्लब' या 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (UfC) के नाम से जानती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र के दौरान इस समूह ने एक बार फिर सुरक्षा परिषद में नई स्थायी सीटें जोड़े जाने का खुलकर विरोध किया है, जिसके बाद से वैश्विक कूटनीति में सरगर्मी काफी बढ़ गई है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाती है, जिसमें केवल पांच देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन स्थायी सदस्य हैं और जिनके पास वीटो पावर है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में सबसे बड़ा सैन्य योगदान देने वाला देश होने के नाते स्थायी सीट का प्रबल दावेदार है। हालांकि, पाकिस्तान, तुर्की और इटली जैसे देशों के नेतृत्व वाला 'कॉफी क्लब' इस बात पर अड़ा है कि सुरक्षा परिषद में किसी भी नए देश को स्थायी सदस्यता नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इससे सदस्य देशों के बीच असमानता और विशेषाधिकारों की खाई और अधिक चौड़ी हो जाएगी।
क्या है 'कॉफी क्लब' और इसके विरोध की असली कूटनीतिक वजहें?
'कॉफी क्लब' यानी 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' समूह की नींव 1990 के दशक में पड़ी थी, जिसमें शुरुआती दौर में इटली, पाकिस्तान, मिस्र और मैक्सिको जैसे देश शामिल हुए थे। वर्तमान में इस समूह में लगभग 12 से ज्यादा सक्रिय देश शामिल हैं, जिनमें मुख्य रूप से इटली, पाकिस्तान, तुर्की, स्पेन, अर्जेंटीना, कनाडा और दक्षिण कोरिया जैसे देश प्रमुखता से अपनी भूमिका निभाते हैं। इस क्लब के गठन का मुख्य उद्देश्य G4 देशों (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) की ओर से पेश किए जाने वाले स्थायी सदस्यता के प्रस्तावों को निष्प्रभावी करना और रोकना है।
पाकिस्तान की भारत की उम्मीदवारी के खिलाफ विरोध के पीछे उसकी पुरानी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय वर्चस्व की चिंताएं जुड़ी हैं। वहीं दूसरी ओर, इटली अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी जर्मनी को यूएनएससी में स्थायी सीट मिलने के सख्त खिलाफ है, ताकि यूरोप में शक्ति संतुलन बिगड़ने न पाए। इसके अलावा, तुर्की के राष्ट्रपति जैसे नेता भी वैश्विक मंचों पर वीटो पावर व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करने या इसके दायरे को सीमित करने की मांग लगातार उठाते रहे हैं। कॉफी क्लब का तर्क है कि स्थायी सीटें बढ़ाने के बजाय केवल गैर-स्थायी (अस्थायी) सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, जिनका चुनाव एक निश्चित समयावधि के लिए क्षेत्रीय आधार पर轮 rotational तरीके से हो।
वीटो पावर का विरोध और भविष्य की वैश्विक चुनौतियां
कॉफी क्लब का यह समूह केवल स्थायी सीटों के विस्तार का ही विरोध नहीं करता, बल्कि यह सुरक्षा परिषद के सबसे विवादित हथियार यानी 'वीटो पावर' के भी खुलकर खिलाफ है। समूह का यह स्पष्ट मानना है कि मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों के पास मौजूद वीटो पावर अंतरराष्ट्रीय न्याय और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। हाल ही में तुर्की और अन्य सदस्य देशों ने यह मुद्दा फिर उठाया है कि बड़े पैमाने पर मानवता के खिलाफ अपराध या युद्ध अपराध जैसी गंभीर परिस्थितियों में वीटो के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगनी चाहिए या इसे पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, भारत और G4 समूह का कड़ा रुख यह है कि आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए यूएनएससी में व्यापक सुधार बेहद जरूरी हैं। यदि सुरक्षा परिषद में समकालीन वैश्विक ताकतों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, तो संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े होते रहेंगे। भारत लगातार कूटनीतिक माध्यमों से यह समझाता रहा है कि दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देश को वैश्विक सुरक्षा ढांचे के शीर्ष पर जगह न मिलना अन्यायपूर्ण है। बहरहाल, कॉफी क्लब के कड़े विरोध और वीटो के पेंच के कारण संयुक्त राष्ट्र में अंतर-सरकारीू बातचीत (IGN) की प्रक्रिया में अभी भी कोई ठोस आम सहमति नहीं बन पाई है, और वैश्विक कूटनीति का यह मुकाबला आने वाले दिनों में और अधिक तीखा होने की पूरी संभावना है।
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