West Bengal Voter List Row: 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, अधीर रंजन की याचिका से चुनावी प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से करीब 27 लाख नाम हटाए जाने का विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका में दावा किया गया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम बिना उचित प्रक्रिया अपनाए हटा दिए गए। इस कार्रवाई को संविधान के तहत नागरिकों के समानता और मताधिकार से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।

मतदाता सूची संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा करे और मामले में जल्द सुनवाई सुनिश्चित करे। अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

संविधान के कई अनुच्छेदों का हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 326 का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत मिलना चाहिए। किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे उचित सूचना, सुनवाई का अवसर और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।

27 लाख नाम हटने के दावे से बढ़ी राजनीतिक हलचल

पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 27 लाख नाम हटाए जाने के दावे ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इस मुद्दे को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है, जबकि मामला अब न्यायिक जांच के दायरे में पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के बाद इस पूरे विवाद पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

निर्वाचन आयोग पहले भी दे चुका है अपना पक्ष

इस तरह के आरोपों पर पहले निर्वाचन आयोग का कहना रहा है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण पूरी तरह कानून और निर्धारित नियमों के अनुरूप किया जाता है। आयोग के अनुसार इस प्रक्रिया का उद्देश्य फर्जी, मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना होता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंच चुका है, जहां यह तय होगा कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया संवैधानिक मानकों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी या नहीं। अदालत का आगामी रुख न केवल इस विवाद बल्कि भविष्य में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

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