
मध्य पूर्व एक बार फिर से बेहद गंभीर और विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान के खिलाफ एक नए और बड़े सैन्य अभियान की रूपरेखा तैयार कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों के हवाले से यह बड़ा दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी और इजरायली सेनाएं ईरान के परमाणु ठिकानों, ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर और मिसाइल डिपो को निशाना बनाने के लिए पूरी तरह से कमर कस चुकी हैं। इस संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब इजरायल और अमेरिका दोनों ही देशों में राजनीतिक और चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह हमला शुरू होता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की सप्लाई चेन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
चुनावी सरगर्मी के बीच अमेरिका और इजरायल की खुफिया रणनीतिक बैठकें तेज
इजरायल में आगामी चुनावों और राजनीतिक उठापटक के बीच रक्षा प्रतिष्ठानों में बैठकों का दौर लगातार जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतृहू और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने देश के चुनावी माहौल के बीच ईरान की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर गहरी नजर रखी हुई है। हाल ही में इजरायली वायु सेना के दर्जनों लड़ाकू विमानों ने ईरान की सीमा के पास तक एक लंबा ऑपरेशनल सॉर्टे (अभ्यास उड़ान) निकाला, जिसने पूरे क्षेत्र में तनाव को अचानक कई गुना बढ़ा दिया है। हालांकि अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों का एक धड़ा इसे केवल अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन और ईरान को रोकने की एक सोची-समझी रणनीति बता रहा है, वहीं कई खुफिया सूत्रों का यह भी मानना है कि इस प्रकार के आक्रामक कदम किसी भी समय एक बड़े युद्ध की चिंगारी को भड़का सकते हैं।
क्या ईरान के खिलाफ छोटे और तीव्र सैन्य अभियान से बदल जाएगा पश्चिम एशिया का समीकरण
सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और इजरायल जिस नई सैन्य योजना पर काम कर रहे हैं, वह कोई लंबा युद्ध न होकर एक बेहद छोटा और तीव्र (शॉर्ट एंड इंटेंसिव) हवाई हमला हो सकता है। इस संभावित अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान की रीढ़ कहे जाने वाले परमाणु संयंत्रों और ऊर्जा संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचाना है, ताकि तेहरान को कूटनीतिक रूप से घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सके। दूसरी ओर, तेहरान ने भी इन तमाम चेतावनियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी भी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा और इस बार संघर्ष सीमित नहीं रहेगा। इस बीच खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी दूतावासों और सैन्य अड्डों से अपने कर्मचारियों व परिवारों को सुरक्षित बाहर निकालने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिन बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं।
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