कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 15 सालों के निर्बाध शासन के बाद ममता बनर्जी की सत्ता पर ‘ब्रेक’ लग गया है। भाजपा ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है, लेकिन इस हार के बीच कुछ ऐसे बारीक आंकड़े निकलकर सामने आए हैं जो भविष्य की राजनीति के लिए ममता बनर्जी की चिंता बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से राज्य के ‘मुस्लिम वोट बैंक’ के रुख ने राजनीतिक पंडितों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ममता का सबसे मजबूत किला ढह चुका है?
मुस्लिम वोटों का बिखराव: कांग्रेस और लेफ्ट की सदन में वापसी
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामदल (लेफ्ट) का सूपड़ा साफ हो गया था। लेकिन 2026 के नतीजों ने एक नया संकेत दिया है। इस बार विधानसभा में कांग्रेस के दो उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है और दोनों ही मुस्लिम हैं। वहीं, सीपीएम के मुस्तफिजुर रहमान ने डोमकाल सीट से जीत हासिल कर वामदलों का खाता खोल दिया है। ये तीनों सीटें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आती हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मुस्लिमों का एक हिस्सा अब टीएमसी के बजाय अपने पुराने विकल्पों की ओर लौटने लगा है।
हुमायूं कबीर का ‘बाबरी दांव’ और दीदी को झटका
ममता बनर्जी से बगावत कर अपनी अलग राह चुनने वाले हुमायूं कबीर ने इस चुनाव में बड़ा खेल कर दिया। हुमायूं कबीर खुद नोवदा और रेजीनगर, दो सीटों से चुनाव जीत गए हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बाबरी के नाम पर मस्जिद बनाने का वादा किया था और वह लगातार ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर हमलावर रहे। उनकी जीत इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर मुस्लिम नेता अब ममता के नेतृत्व को चुनौती देने लगे हैं।
ध्रुवीकरण के फेर में फंसी टीएमसी
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी ने मुस्लिमों को एकजुट करने के लिए जितनी ताकत लगाई, भाजपा ने उसके जवाब में हिंदू ध्रुवीकरण को उतनी ही मजबूती से धार दी। नतीजों से लगता है कि भाजपा हिंदू मतों को गोलबंद करने में सफल रही, जबकि टीएमसी का मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस, आईएसएफ और हुमायूं कबीर जैसे नेताओं के बीच बंट गया। ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकती है क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक ही उनकी राजनीति की रीढ़ रहा है।
अब क्या करेंगी ममता? सड़क की जंग या उपचुनाव का रास्ता?
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद भवानीपुर से चुनाव हार चुकी हैं। अब उनके पास दो विकल्प हैं:
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उपचुनाव: किसी सुरक्षित सीट से उपचुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचें और विपक्ष की नेता के तौर पर सदन में भाजपा को घेरें।
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सड़क की राजनीति: सदन की कमान किसी और को सौंपकर खुद वापस ‘स्ट्रीट फाइटर’ की भूमिका में आ जाएं और 2011 की तरह फिर से जमीन पर पार्टी खड़ी करें।
भाजपा के प्रचंड बहुमत और मुस्लिम वोट बैंक में आई दरार के बाद, ममता बनर्जी को अपनी रणनीति में ‘कोर्स करेक्शन’ (सुधार) करना होगा। क्या वह फिर से तिनका-तिनका जोड़कर टीएमसी को खड़ा कर पाएंगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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