‘किसी भी कीमत पर हो डील’, ईरान से समझौता करने के लिए क्यों बेताब हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप? जानिए इसके पीछे छिपे बड़े कूटनीतिक और आर्थिक कारण

दुनिया की महाशक्तियों और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ किसी भी हाल में एक ठोस समझौता करने के लिए इतने उत्सुक और तत्पर क्यों नजर आ रहे हैं? हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच जिस तरह से ट्रंप प्रशासन ने अपने सैन्य हमलों को रोककर कूटनीति और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता दी है, उसने दुनिया भर के विश्लेषकों को चौंका दिया है। एक तरफ जहां अमेरिका अपनी सैन्य ताकत के दम पर किसी भी दुश्मन को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप का यह रुख यह साफ करता है कि कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर एक समझौता वक्त की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई ऐसे गंभीर भू-राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक कारण छिपे हैं, जिन्हें समझना वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद आवश्यक है।

खाड़ी देशों के भारी दबाव और खाड़ी युद्ध का बढ़ता खतरा

डोनाल्ड ट्रंप के इस रुख के पीछे सबसे बड़ा तात्कालिक कारण उनके अपने क्षेत्रीय सहयोगी खाड़ी देशों का भारी कूटनीतिक दबाव है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और कतर जैसे प्रमुख खाड़ी देश किसी भी कीमत पर एक और बड़े क्षेत्रीय युद्ध की विभीषिका नहीं झेलना चाहते हैं। जब अमेरिकी रक्षा विभाग मिडिल ईस्ट में बड़े सैन्य हमलों की योजना तैयार कर रहा था, तब खाड़ी देशों के शीर्ष नेतृत्व ने सीधे तौर पर अमेरिकी प्रशासन के सामने अपनी चिंताएं रखीं। सऊदी क्राउन प्रिंस और अन्य क्षेत्रीय नेताओं ने ट्रंप से दो टूक शब्दों में कहा कि वे बमबारी के बजाय बातचीत और समझौते का रास्ता चुनें, क्योंकि इस तरह के युद्धों का अंजाम अनिश्चित होता है और इसका सीधा असर पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ता है। इन मजबूत सहयोगियों के इसी स्पष्ट दबाव के चलते ट्रंप को अपने सैन्य कदमों को होल्ड पर रखना पड़ा और वे एक समझदारी भरे समझौते की तलाश में जुट गए।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) और ग्लोबल ऑयल मार्केट की चिंता

इस पूरी बेताबी के पीछे दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ कहे जाने वाले ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी तंग समुद्री जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। युद्ध और तनाव के माहौल के कारण इस महत्वपूर्ण मार्ग के बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। तेल आपूर्ति में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा असर दुनिया भर के शेयर बाजारों, महंगाई दर और आम आदमी की जेब पर पड़ता है। अमेरिका जैसे देश, जो घरेलू महंगाई और आर्थिक स्थिरता को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, वे लंबे समय तक महंगे तेल और आर्थिक दबाव को सहन नहीं कर सकते हैं। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित और निर्बाध रूप से चालू कराने के लिए ईरान के साथ किसी भी सूरत में एक व्यावहारिक समझौता चाहता है।

अमेरिका के खाड़ी सहयोगी क्यों चाहते हैं जंग के बजाय शांति समझौता?

खाड़ी के देश अब पारंपरिक युद्धों के बजाय आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और अपनी बुनियादी योजनाओं पर फोकस कर रहे हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक युद्ध छिड़ता है, तो उसका सबसे पहला और विनाशकारी शिकार ये पड़ोसी देश ही बनेंगे। उनके तेल रिफाइनरियों, हवाई अड्डों और बुनियादी ढांचे को हूती या अन्य समूहों द्वारा निशाना बनाए जाने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। यही कारण है कि सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अब कूटनीति और क्षेत्रीय संवाद के जरिए मामलों को सुलझाने की वकालत कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि वाशिंगटन की आक्रामक नीतियों के कारण उनकी अपनी आर्थिक तरक्की पटरी से उतर जाए। ट्रंप इस जमीनी हकीकत को अच्छी तरह समझ चुके हैं, इसलिए वे अपने सहयोगियों की संतुष्टि और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक समझौते की जमीन तैयार करने में लगे हुए हैं।

डोनाल्ड ट्रंप का यू-टर्न और कूटनीति को एक और मौका देने की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषक इस बात को लेकर भी हैरान हैं कि अपनी आक्रामक छवि के लिए मशहूर डोनाल्ड ट्रंप ने किस तरह अचानक अपने तेवर नरम कर लिए हैं। ट्रंप ने खुद सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि उन्होंने अमेरिकी सेना को बड़े हमलों से पीछे हटने का आदेश इसलिए दिया क्योंकि वे कूटनीति को एक निष्पक्ष और अंतिम मौका देना चाहते थे। अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति चुनाव से लेकर घरेलू जनमानस तक, अमेरिकी जनता लंबे और अंतहीन विदेशी युद्धों से उब चुकी है। ट्रंप अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) की नीति के तहत अपने सैनिकों को विदेशों में उलझाने के बजाय घरेलू मोर्चे और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। ईरान के साथ एक सफल डील उनके राजनीतिक प्रोफाइल को एक ‘शांतिदाता’ (Peacemaker) के रूप में स्थापित कर सकती है, जो उनके आगामी राजनीतिक सफर के लिए भी काफी फायदेमंद साबित हो सकती है।

ईरान के साथ समझौते के पीछे आर्थिक और राजनीतिक मजबूरियां

दूसरी ओर, ईरान भी लंबे समय से चले आ रहे अमेरिकी प्रतिबंधों, गंभीर आर्थिक संकट और अंदरूनी राजनीतिक उथल-पुथल के कारण अत्यधिक दबाव में है। अमेरिकी और इजरायली सैन्य कार्रवाई के खतरे के साए में जी रहे तेहरान के लिए भी अपनी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने का एकमात्र रास्ता पश्चिमी देशों के साथ प्रतिबंधों में ढील हासिल करना है। अमेरिकी प्रशासन यह अच्छी तरह जानता है कि केवल सैन्य ताकत या प्रतिबंधों के जरिए ईरान को हमेशा के लिए नहीं दबाया जा सकता, बल्कि एक संरचित और टिकाऊ समझौते के माध्यम से ही उसके परमाणु कार्यक्रमों पर स्थायी लगाम लगाई जा सकती है। आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और जमे हुए वित्तीय फंड्स को जारी करने जैसी रियायतों के बदले में ईरान से समुद्र की सुरक्षा और परमाणु गतिविधियों पर रोक की गारंटी लेना ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति का मुख्य हिस्सा बन चुका है।

क्या इस डील से मिडिल ईस्ट में थमेगा संघर्ष और वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिलेगी राहत?

अंत में यह सवाल सबसे अहम है कि क्या ट्रंप की यह बेताबी और ईरान के साथ होने वाली यह संभावित डील मिडिल ईस्ट में स्थाई शांति स्थापित कर पाएगी या नहीं। यदि यह समझौता सिरे चढ़ जाता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से सुरक्षित हो जाता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिलेगा। कच्चे तेल के दाम नीचे आएंगे, महंगाई नियंत्रित होगी और भारत जैसे तेल-आयात करने वाले देशों को भी बड़ी राहत मिलेगी जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। हालांकि, ईरान के भीतर के कट्टरपंथी धड़ों और क्षेत्रीय आपत्तियों के बीच इस डील को धरातल पर उतारना इतना आसान भी नहीं होगा। इसके बावजूद, यह स्पष्ट है कि डोनाल्ड ट्रंप हर हाल में एक ऐसी डील चाहते हैं जो उनके कार्यकाल को ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता के रूप में दर्ज करा सके और दुनिया को एक बड़े आर्थिक व सैन्य संकट से बचा सके।

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