नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और असम में ‘हैट्रिक’ के बाद सियासत के गलियारों से चौंकाने वाली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अपनी विद्वत्ता और अलग अंदाज के लिए जाने जाने वाले कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी की जमकर सराहना की है। थरूर ने साफ तौर पर कहा कि देश के अन्य राजनीतिक दलों को इस जोड़ी की चुनावी विशेषज्ञता और सांगठनिक क्षमता से सबक लेना चाहिए।
मोदी-शाह की ‘प्रोफेशनल’ चुनावी मशीनरी के कायल हुए थरूर
शशि थरूर ने मंगलवार को एक बयान में भाजपा के चुनावी प्रबंधन की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी प्रोफेशनल ढंग से संगठित है और चुनाव लड़ने व जीतने की कला में माहिर है।” थरूर ने आगे कहा कि भाजपा एक बेहद संगठित दल है जो चुनावी अभियान के दौरान लगातार सुधार करता रहता है। उन्होंने पार्टी के संसाधनों (Resources) के सटीक इस्तेमाल और आर्थिक प्रबंधन को भी जीत का एक बड़ा आधार बताया।
सांगठनिक क्षमता और विशेषज्ञता की दी मिसाल
थरूर ने बंगाल और असम के नतीजों का हवाला देते हुए कहा कि इतनी बड़ी जीत केवल मोदी और शाह की सांगठनिक क्षमता और विशेषज्ञता के कारण ही संभव हो पाई है। कांग्रेस सांसद ने अन्य विपक्षी दलों को नसीहत देते हुए कहा कि भाजपा जिस तरह से चुनाव अभियान का संचालन करती है, वह वाकई सीखने लायक है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी विपक्षी राजनीति बंगाल में भाजपा की प्रचंड लहर से सहमी हुई है।
केरल की जीत पर बोले- ‘कांग्रेस को अब आत्मनिरीक्षण की जरूरत’
जहाँ एक तरफ थरूर ने भाजपा की तारीफ की, वहीं केरल में कांग्रेस-नीत यूडीएफ (UDF) की शानदार वापसी पर अपनी पार्टी को आईना भी दिखाया। उन्होंने कहा, “केरल में हमने ऐतिहासिक वापसी की है, लेकिन अब समय आत्मनिरीक्षण का है। अगर हम केरल में जीत सकते हैं, तो अन्य राज्यों में क्यों नहीं?” थरूर ने इसे कांग्रेस के लिए एक बड़ा सबक करार दिया।
केरल का गणित: 10 साल बाद यूडीएफ की सत्ता में वापसी
बता दें कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 140 में से 102 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है।
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कांग्रेस: 63 सीटें
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मुस्लिम लीग: 22 सीटें
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भाजपा: 3 सीटें (पहली बार राज्य में खाता खोला)
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एलडीएफ (वाम दल): भारी नुकसान के साथ सत्ता से बाहर।
शशि थरूर के इस बयान ने कांग्रेस के भीतर भी एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या वाकई अब भाजपा के चुनावी मॉडल को समझे बिना विपक्ष की राह आसान नहीं होगी।
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