
पश्चिमी यूरोपीय देश फ्रांस एक बार फिर बड़े पैमाने पर नागरिक अशांति और सड़कों पर तीखे विरोध प्रदर्शनों की आग में घिर गया है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर, स्कूलों के वार्षिक बजट में भारी कटौती और शिक्षकों के हजारों रिक्त पदों को समाप्त करने की सरकारी योजना के विरोध में पूरा देश हड़ताल की चपेट में आ गया है। शिक्षक यूनियनों, छात्र संगठनों और आम नागरिकों के संयुक्त आह्वान पर राजधानी पेरिस समेत देश के कई बड़े शहरों में जबरदस्त रैलियां निकाली गईं। आंतरिक मंत्रालय और मजदूर यूनियनों द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 2.66 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ आरोप है कि इमैनुएल मैक्रों प्रशासन सरकारी स्कूलों की उपेक्षा कर निजीकरण को बढ़ावा दे रहा है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
पेरिस, ल्योन और मार्सिले में भड़की हिंसा: पुलिस ने बरसाईं लाठियां और छोड़े आंसू गैस के गोले
राजधानी पेरिस की सड़कों पर स्थिति उस वक्त बेकाबू हो गई जब 'प्लेस डी ला रिपब्लिक' और 'प्लेस डे ला नेशन' के बीच मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों के मुख्य जुलूस में कुछ उपद्रवी तत्व घुस गए। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्रालय की नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और कई स्थानों पर कचरे के डिब्बों में आग लगाकर बैरिकेड्स तोड़ने का प्रयास किया। उग्र भीड़ को तितर-बितर करने और सरकारी इमारतों की सुरक्षा के लिए तैनात फ्रांसीसी दंगा रोधी पुलिस (CRS) ने भारी वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले (Tear Gas) दागे। ल्योन, मार्सिले, टूलूज़ और नैनटेस जैसे शहरों में भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें दर्ज की गईं, जहां दर्जनों लोगों को हिरासत में लिया गया और कई पुलिसकर्मी व प्रदर्शनकारी घायल हो गए।
आखिर क्या हैं प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें और हड़ताल की वजह
फ्रांस के प्रमुख शिक्षक यूनियनों (FSU, CGT Éduc'action और SUD Éducation) ने सरकार के आगामी बजट ड्राफ्ट के खिलाफ मोर्चा खोला है। शिक्षकों और अभिभावकों के मुख्य विरोध बिंदु इस प्रकार हैं:
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शिक्षकों के पदों में भारी कटौती का विरोध: सरकार ने वित्तीय घाटे को पाटने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूलों से हजारों शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है, जिसका सीधा असर क्लासरूम में छात्रों की संख्या पर पड़ेगा।
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वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य परिस्थितियां: बढ़ती मुद्रास्फीति और जीवन-यापन के भारी खर्च के मुकाबले शिक्षकों के वेतन में लंबे समय से कोई ठोस संशोधन नहीं हुआ है, जिससे योग्य युवा इस पेशे से दूर हो रहे हैं।
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स्कूलों के बुनियादी ढांचे के लिए फंड की कमी: कई ग्रामीण और उपनगरीय इलाकों के सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर हालत में हैं, हीटिंग और बुनियादी शैक्षणिक संसाधनों के लिए बजट में लगातार कटौती की जा रही है।
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निजी स्कूलों के पक्षपात का आरोप: यूनियनों का दावा है कि सरकारी खजाने का पैसा निजी और संभ्रांत स्कूलों को सब्सिडी देने में खर्च हो रहा है, जबकि आम जनता के पब्लिक स्कूल उपेक्षा के शिकार हैं।
सार्वजनिक सेवाओं और स्कूल संचालन पर पड़ा देशव्यापी असर
इस व्यापक विरोध प्रदर्शन और हड़ताल के चलते पूरे फ्रांस में प्राथमिक, माध्यमिक विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ताले लटक गए हैं। कई बड़े शहरों में लगभग 40% से 50% प्राथमिक स्कूल पूरी तरह बंद रहे, जिससे लाखों कामकाजी अभिभावकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों के समर्थन में रेलवे, मेट्रो और बस परिवहन यूनियनों के आंशिक रूप से शामिल होने से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी चरमरा गई। अस्पतालों और नगरपालिका कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडलों ने भी शिक्षा बचाओ मार्च में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिससे यह आंदोलन केवल शिक्षकों तक सीमित न रहकर एक व्यापक सामाजिक आक्रोश में बदल चुका है।
मैक्रों सरकार के सामने नई राजनीतिक और सामाजिक चुनौती
संसदीय गतिरोध और आर्थिक सुधारों को लेकर पहले से दबाव झेल रही फ्रांसीसी सरकार के लिए यह जनविद्रोह एक नई और गंभीर चुनौती बन गया है। विपक्षी दलों ने संसद में शिक्षा बजट को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और तत्काल आपातकालीन फंडिंग जारी करने की मांग की है। वहीं, प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्रालय ने स्थिति को शांत करने के लिए यूनियन नेताओं को वार्ता की मेज पर आने का न्योता दिया है, लेकिन यूनियनों ने साफ कर दिया है कि जब तक बजट कटौती का फैसला वापस नहीं लिया जाता और नए शिक्षकों की भर्ती सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक देशव्यापी आंदोलन और हड़ताल का यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा।
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