आजमगढ़/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होने से पहले ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अब पूर्वांचल में एक बड़ा ‘दांव’ खेलने की तैयारी कर ली है। अब तक केवल राजभर समाज और पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले राजभर अब ‘सर्वसमाज’ का नेता बनने की राह पर हैं। इसी कड़ी में आगामी रविवार को आजमगढ़ के अतरौलिया में होने वाली ‘सामाजिक समरसता महारैली’ चर्चा का विषय बनी हुई है।
एक लाख की भीड़ और 10 हजार ब्राह्मणों का दावा
ओम प्रकाश राजभर का दावा है कि इस रैली में एक लाख से अधिक लोग जुटेंगे। लेकिन सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि इसमें 10 हजार से ज्यादा ब्राह्मण शामिल होंगे। राजभर की यह रणनीति स्पष्ट संकेत दे रही है कि वे अपनी पहचान केवल एक जाति विशेष के नेता तक सीमित नहीं रखना चाहते। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि राजभर ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने में सफल रहते हैं, तो यह पूर्वांचल की कई सीटों पर जीत-हार का नया फॉर्मूला तय कर सकता है।
ब्राह्मणों पर हर दल की नजर: 12% आबादी, पर असर दोगुना
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 12 फीसदी मानी जाती है, लेकिन उनकी राय अन्य समुदायों के मतदान पैटर्न को भी प्रभावित करती है।
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बीजेपी: ब्राह्मणों को अपना कोर वोटर मानती है।
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सपा: ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ब्राह्मण सम्मेलनों के जरिए सेंधमारी की कोशिश में है।
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बसपा: ‘सर्वजन हिताय’ के पुराने फॉर्मूले को दोबारा जिंदा करने में जुटी है। ऐसे में राजभर का ब्राह्मणों को साधने का प्रयास एनडीए के भीतर उनकी सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) को और बढ़ा सकता है।
क्यों शुरू हुई ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चा?
ब्राह्मण राजनीति में उबाल तब आया जब पिछले साल विधानसभा सत्र के दौरान ब्राह्मण विधायकों की एक गुप्त बैठक की तस्वीरें वायरल हुईं। विपक्ष ने इसे बीजेपी के भीतर ‘ब्राह्मणों की उपेक्षा’ के रूप में प्रचारित किया। बाद में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष द्वारा कुछ विधायकों को नोटिस दिए जाने के बाद इस चर्चा को और हवा मिली। राजभर इसी कथित ‘नाराजगी’ को भुनाने के लिए अपनी रैली में ब्राह्मण चेहरों को आगे कर रहे हैं।
राजभर की साख दांव पर: दिल्ली तक जाएगी गूंज!
ओम प्रकाश राजभर अपनी बेबाक बयानबाजी और जमीनी संगठन के लिए जाने जाते हैं। रविवार की रैली उनके राजनीतिक भविष्य के लिए ‘लिटमस टेस्ट’ जैसी है।
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अगर सफल हुए: तो लखनऊ से दिल्ली तक यह संदेश जाएगा कि राजभर अब केवल राजभर वोटों के नहीं, बल्कि सवर्णों के भी प्रभावशाली नेता बन चुके हैं।
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अगर दावे फेल हुए: तो उनकी राजनीतिक साख पर सवाल उठ सकते हैं और गठबंधन में उनकी पकड़ कमजोर हो सकती है।
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