लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक फिल्म के टाइटल ने वो कर दिखाया है जो बड़े-बड़े राजनीतिक वादे नहीं कर पाए। मनोज वाजपेयी की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर प्रदेश में ऐसा भूचाल आया कि सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, सब एक सुर में खड़े नजर आए। आलम यह हुआ कि लखनऊ में एफआईआर (FIR) दर्ज होने के चंद घंटों के भीतर केंद्र सरकार को फिल्म के आपत्तिजनक कंटेंट पर रोक लगानी पड़ी। आखिर एक टाइटल को लेकर यूपी में इतना बड़ा ‘सिस्टम’ क्यों एक्टिव हो गया? आइए समझते हैं इस विवाद के पीछे का असली खेल।
सत्ता और विपक्ष में ‘श्रेय’ लेने की होड़
हैरानी की बात यह है कि जो दल सदन में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते हैं, वे इस फिल्म के विरोध में एक साथ आ गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर लखनऊ में मामला दर्ज हुआ, तो अगले ही दिन केंद्र ने कड़ा रुख अपनाया। अब उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक इस कार्रवाई का श्रेय खुद को दे रहे हैं, तो बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी अपनी भूमिका को अहम बता रहे हैं। वहीं, विपक्षी दल कांग्रेस, सपा और बसपा इसे ब्राह्मणों के स्वाभिमान से जोड़कर सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।
सियासी उबाल: ब्राह्मण संगठनों का सड़क पर उतरना
भले ही केंद्र ने आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के निर्देश दे दिए हों, लेकिन ब्राह्मण संगठनों का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है। यूपी के कई शहरों में फिल्म पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर प्रदर्शन जारी हैं। विपक्षी नेताओं जैसे अखिलेश यादव और अजय राय ने इस मुद्दे पर बीजेपी को आड़े हाथों लिया। मायावती ने भी इसे ब्राह्मण समाज का अपमान बताते हुए मोर्चा खोल दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ एक फिल्म का विरोध है या 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाई जा रही है?
क्यों ‘ब्रह्मास्त्र’ बना है ब्राह्मण वोट बैंक?
यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वोट हमेशा से निर्णायक रहा है। हाल के महीनों में ब्राह्मण विधायकों की बैठकों और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के फैसलों को ‘ब्राह्मण विरोधी’ बताकर विपक्ष ने नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है।
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बीएसपी फैक्टर: मायावती ने साफ संकेत दिए हैं कि वह 2007 वाला ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (दलित+ब्राह्मण) फॉर्मूला दोहराना चाहती हैं। उन्होंने घोषणा की है कि अगर ब्राह्मण और सवर्ण वोट ट्रांसफर की गारंटी मिले, तभी वह गठबंधन करेंगी।
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बीजेपी की घेराबंदी: बीजेपी अपने इस पारंपरिक कोर वोट बैंक को खिसकने नहीं देना चाहती, यही वजह है कि सरकार ने फिल्म के खिलाफ इतनी त्वरित कार्रवाई की।
जब विवादों के कारण बदले गए फिल्मों के नाम
‘घूसखोर पंडत’ पहली फिल्म नहीं है जिसे विरोध का सामना करना पड़ा है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं: | फिल्म का मूल नाम | विरोध का कारण | नया नाम | बिल्लू बार्बर | नाई समाज की आपत्ति | बिल्लू | | रामलीला | धार्मिक भावनाएं | गोलियों की रासलीला – रामलीला | | पद्मावती | क्षत्रिय संगठनों का विरोध | पद्मावत | | लक्ष्मी बम | धार्मिक नाम पर आपत्ति | लक्ष्मी | | लवरात्रि | नवरात्रि से समानता पर विवाद | लवयात्री |
फिल्म निर्माताओं की सफाई: नीरज पांडे और मनोज वाजपेयी ने क्या कहा?
विवाद बढ़ता देख फिल्म के निर्माता नीरज पांडे और मुख्य अभिनेता मनोज वाजपेयी ने आधिकारिक बयान जारी कर सफाई दी है। उन्होंने साफ किया है कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। विरोध को देखते हुए उन्होंने फिल्म का प्रमोशनल कंटेंट और टीजर तुरंत प्रभाव से हटा लिया है और केंद्र के निर्देशों के पालन का आश्वासन दिया है।
निष्कर्ष: फिलहाल ‘घूसखोर पंडत’ का नाम बदलना लगभग तय है, लेकिन यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों को रिझाने का यह खेल अभी लंबा चलेगा। अगले साल होने वाले चुनावों में यह वर्ग किसकी तरफ झुकता है, यही यूपी की सत्ता का भविष्य तय करेगा।
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