76 दिन बाद बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, फिर भी दुनिया में सबसे सस्ता ईंधन! जानिए 4 साल में कितना बदला पूरा गणित

नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार मार्गों में बढ़ते तनाव के बीच आखिरकार भारत में 76 दिनों बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव देखने को मिला है। हालांकि आम लोगों की जेब पर इसका असर जरूर पड़ेगा, लेकिन राहत की बात यह है कि तमाम बढ़ोतरी के बावजूद भारत आज भी दुनिया के कई बड़े देशों की तुलना में सस्ता पेट्रोल-डीजल उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। पिछले चार वर्षों का आंकड़ा देखें तो तेल कंपनियों ने कई उतार-चढ़ाव के बावजूद कीमतों को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखा।

अंतरराष्ट्रीय संकट का असर, फिर बदले दाम

बीते कुछ महीनों में मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट ने वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में सप्लाई प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होने का असर धीरे-धीरे भारत तक भी पहुंचा। करीब 76 दिनों तक स्थिर रहने के बाद तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संशोधन किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आती है तो आने वाले समय में ईंधन दरों में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि केंद्र सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल उपभोक्ताओं पर ज्यादा बोझ डालने से बचने की कोशिश कर रही हैं।

4 साल में कैसे बदले पेट्रोल-डीजल के भाव

अगर पिछले चार वर्षों का रिकॉर्ड देखें तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बड़ी उछाल और राहत दोनों देखने को मिलीं। कोरोना महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था खुलने लगी तो कच्चे तेल की मांग तेजी से बढ़ी। इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया।

उस दौरान भारत में भी पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार बढ़े। कई शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया था। बाद में केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती की, जिससे आम जनता को राहत मिली। इसके बाद लंबे समय तक तेल कंपनियों ने कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया।

दुनिया के मुकाबले भारत में अब भी सस्ता ईंधन

भले ही भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा महसूस होता हो, लेकिन टैक्स और आयात लागत के बावजूद कई विकसित देशों की तुलना में यहां ईंधन की कीमतें कम हैं। यूरोप के कई देशों में पेट्रोल की कीमत भारत से कहीं अधिक है। वहीं पड़ोसी देशों और एशियाई बाजारों के मुकाबले भी भारत की स्थिति संतुलित मानी जा रही है।

भारत सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए टैक्स नीति और तेल कंपनियों के मुनाफे के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखा गया।

आम आदमी पर कितना पड़ेगा असर

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मामूली बदलाव का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है। इससे सब्जियों, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा के सामान की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल बढ़ोतरी सीमित है, इसलिए महंगाई पर इसका बड़ा असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा।

आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और कच्चे तेल की सप्लाई पर काफी कुछ निर्भर करेगा। यदि वैश्विक हालात सामान्य रहते हैं तो भारतीय उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिल सकती है।

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