
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दांवपेंच का दौर हमेशा से जारी रहा है, और इस बार जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की बैठक के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के मुद्दों को लेकर तीखी तनातनी देखने को मिली है। मानवाधिकार परिषद में पारित हुए एक नए प्रस्ताव को लेकर पाकिस्तान ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत करार दिया है। इस प्रस्ताव में विशेष रूप से सीमा-पार जल सहयोग (Cross-Border Water Cooperation) और सुरक्षित पेयजल के अधिकारों को लेकर चर्चा की गई है। पाकिस्तान ने इस मंच का खुलकर इस्तेमाल करते हुए भारत पर सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) और साझा जल संसाधनों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। वैश्विक कूटनीति के लिहाज से इस घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि दक्षिण एशिया के इन दो पड़ोसी देशों के बीच पानी का मुद्दा लंबे समय से तनाव की मुख्य वजहों में से एक रहा है। इस पूरी रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर जिनेवा में क्या कुछ घटा और इसके भू-राजनीतिक मायने क्या हैं।
जिनेवा में पारित हुआ नया प्रस्ताव और पाकिस्तान का रुख
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के सत्र के दौरान सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के मानवाधिकारों से जुड़े एक मसौदे पर विचार चल रहा था। इसी चर्चा के दौरान पाकिस्तान ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और वैश्विक मंच पर भारत के खिलाफ अपनी बात रखने की कोशिश की। पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने जिनेवा में दावा किया कि सीमा-पार जल संसाधनों के मामले में ऊपरी हिस्से वाले देशों यानी अपस्ट्रीम देशों को पानी का इस्तेमाल कूटनीतिक दबाव या हथियार के रूप में नहीं करना चाहिए। पाकिस्तान का तर्क था कि जहां नदियां और जल संसाधन साझा हैं, वहां जिम्मेदारियां भी साझा होनी चाहिए। पाकिस्तानी राजनयिकों ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन और जल संकट के इस दौर में किसी भी देश को एकतरफा फैसलों के जरिए下游 के देशों की जनता के मानवाधिकारों का हनन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम को पाकिस्तान अपने कूटनीतिक हल्कों में एक बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सिंधु जल संधि का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है।
सीमा-पार जल सहयोग के जिक्र पर भारत और पाकिस्तान की खींचतान
इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम के पीछे सबसे बड़ा विवाद प्रस्ताव के अंदर 'सीमा-पार जल सहयोग' शब्दों को शामिल करने को लेकर था। diplomatic सूत्रों के अनुसार, भारत ने इस बात का कड़ा विरोध किया था कि मानवाधिकार परिषद जैसे मंच का इस्तेमाल द्विपक्षीय संधियों, विशेषकर सिंधु जल संधि के मामलों को उठाने या उस पर दबाव बनाने के लिए किया जाए। भारत का हमेशा से यह स्पष्ट रुख रहा है कि सिंधु जल संधि जैसे तकनीकी और द्विपक्षीय मामलों को आपसी बातचीत के जरिए ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मंचों पर इसका राजनीतिकरण किया जाना चाहिए। इसके बावजूद, अंतिम रूप से पारित हुए प्रस्ताव में सीमा-पार जल सहयोग से जुड़े बिंदुओं के बने रहने पर पाकिस्तान ने इसे अपनी जीत बताया है। जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान इस मंच का उपयोग करके वैश्विक समुदाय का ध्यान अपनी जल सुरक्षा और भारत के साथ चल रहे समझौतों के गतिरोध की ओर आकर्षित करना चाहता था, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके।
सिंधु जल संधि और क्षेत्रीय भू-राजनीति पर इसके संभावित असर
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि दुनिया की सबसे सफल जल-बंटवारा संधियों में गिनी जाती है, लेकिन पिछले कुछ समय से इसमें संशोधन और आधुनिक वास्तविकताओं को जोड़ने को लेकर दोनों देशों के बीच खींचतान बढ़ी है। जलवायु परिवर्तन, नदी घाटियों में बढ़ती आबादी और अनियंत्रित भूजल दोहन जैसी समस्याओं के चलते इस संधि को आधुनिक समय के अनुकूल बनाने की मांग लगातार उठती रही है। ऐसे में UNHRC जैसे वैश्विक मंच पर मानवाधिकारों के नाम पर इस तरह के प्रस्तावों का आना और पाकिस्तान द्वारा इसका इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करना क्षेत्रीय कूटनीति में एक नया मोड़ लाता है। हालांकि, भारत अपनी कूटनीतिक स्थिति को लेकर पूरी तरह अडिग है और वह किसी भी द्विपक्षीय तकनीकी समझौते पर बाहरी दबाव या अनावश्यक अंतरराष्ट्रीय दखलंदाजी को सिरे से खारिज करता रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जिनेवा में घटी इस घटना का असर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद और भविष्य की बैठकों पर किस रूप में पड़ता है।
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