ईरान-इजराइल जंग के बीच पाकिस्तान बना कूटनीति का केंद्र, 3 बड़े देशों के विदेश मंत्री 30 मार्च को पहुंचेंगे इस्लामाबाद; UAE के युद्ध में कूदने के संकेत

तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव अब 29वें दिन में प्रवेश कर चुका है और हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। इसी बीच मिडिल ईस्ट की बदलती परिस्थितियों के बीच 30 मार्च को एक अहम कूटनीतिक पहल होने जा रही है, जब तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब के विदेश मंत्री पाकिस्तान का दौरा करेंगे। इस दौरान वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात कर क्षेत्रीय हालात पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस्लामाबाद में होगी बड़ी कूटनीतिक बैठक

इस्लामाबाद में प्रस्तावित यह बैठक मिडिल ईस्ट संकट के बाद पहली बड़ी बहुपक्षीय पहल मानी जा रही है, जिसमें एक साथ कई प्रभावशाली देशों के विदेश मंत्री शामिल होंगे। बैठक का मुख्य एजेंडा ईरान-इजराइल संघर्ष, अमेरिका की भूमिका और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव पर चर्चा करना होगा।

सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में युद्ध को रोकने के संभावित रास्तों और कूटनीतिक समाधान पर भी विचार किया जाएगा।

UAE के युद्ध में शामिल होने की अटकलें तेज

दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के भी इस संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले तीन हफ्तों में ईरान की ओर से UAE पर 2200 से अधिक मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए, जिनमें से लगभग 95 प्रतिशत को इंटरसेप्ट कर लिया गया।

इन घटनाओं के बाद UAE का रुख और सख्त हो सकता है, जिससे यह आशंका बढ़ गई है कि वह अमेरिका और इजराइल के साथ मिलकर सीधे युद्ध में उतर सकता है।

पाकिस्तान क्यों बना बातचीत का केंद्र

पाकिस्तान को इस महत्वपूर्ण बैठक के लिए चुना जाना भी अपने आप में खास मायने रखता है। दरअसल, पाकिस्तान के ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ संतुलित और बेहतर रिश्ते हैं, जिससे वह इस संवेदनशील मुद्दे पर एक निष्पक्ष मंच प्रदान कर सकता है।

पहले यह बैठक तुर्किये में प्रस्तावित थी, लेकिन बाद में इसे पाकिस्तान स्थानांतरित कर दिया गया। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण बताए जा रहे हैं—

  • पाकिस्तान फिलहाल किसी भी पक्ष में सीधे शामिल नहीं है, जिससे उसकी छवि एक न्यूट्रल देश की बनी हुई है।
  • ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं, जो बातचीत को आसान बना सकते हैं।
  • तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के साथ भी पाकिस्तान के कूटनीतिक रिश्ते स्थिर और सकारात्मक हैं।

मिडिल ईस्ट में बढ़ती अस्थिरता

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि UAE इस युद्ध में शामिल होता है, तो यह संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है और वैश्विक स्तर पर भी इसके गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

ऐसे में इस्लामाबाद में होने वाली यह बैठक न केवल क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।

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