
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी जांच के दायरे में इस समय एक बेहद चौंकाने वाला और सनसनीखेज मामला भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत के सामने पहुंचा है। म्यांमार के भीतर चल रहे गुप्त विद्रोही ट्रेनिंग कैंपों और वहां के सशस्त्र समूहों को अत्याधुनिक ड्रोन युद्ध (Drone Warfare) की ट्रेनिंग देने के मुख्य आरोपी अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक (Matthew VanDyke) आखिरकार अमेरिका से भारत और एनआईए के शिकंजे में लौट आए हैं। दिल्ली स्थित एनआईए की विशेष अदालत में उनकी इस बहुप्रतीक्षित पेशी के बाद से एशियाई और पश्चिमी कूटनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह मामला इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि म्यांमार की सीमा से सटे पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में इस तरह के विदेशी हस्तक्षेप और हथियारों की तस्करी का सीधा असर राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
मैथ्यू वैनडाइक लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मीडिया और युद्ध क्षेत्रों में अपनी सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। एक अमेरिकी फिल्म निर्माता, पूर्व डाक्यूमेंट्री मेकर और खुद को तथाकथित ‘स्वयंसेवी सैनिक’ बताने वाले वैनडाइक पर यह गंभीर आरोप है कि उन्होंने म्यांमार में सक्रिय विभिन्न विद्रोही और उग्रवादी संगठनों को सैन्य रणनीति, हथियारों के इस्तेमाल और आधुनिक ड्रोन युद्ध की विशेष ट्रेनिंग दी है। भारतीय खुफिया एजेंसियों और एनआईए के पास इस बात के पुख्ता डिजिटल और दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि वैनडाइक ने सीमा पार सक्रिय इन समूहों को न केवल सामरिक मार्गदर्शन दिया, बल्कि आधुनिक तकनीक और ड्रोन उपकरणों के जरिए युद्ध की क्षमता बढ़ाने में भी मदद की। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध के बीच इस प्रकार के बाहरी विदेशी तत्वों की संलिप्तता ने एशियाई देशों की सरकारों की नींद उड़ा रखी है।
जैसे ही मैथ्यू वैनडाइक ने भारत की सीमा में प्रवेश किया और एनआईए के रडार पर आए, एजेंसी ने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए उन्हें संबंधित विशेष अदालत के समक्ष पेश किया। कोर्ट रूम में हुई सुनवाई के दौरान एनआईए के वकीलों ने अदालत को बताया कि यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार अंतरराष्ट्रीय हथियारों के तस्करों, गुप्त फंडिंग नेटवर्क और कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हो सकते हैं। एजेंसी का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि वैनडाइक के पीछे कौन सी बड़ी ताकतें काम कर रही थीं और उन्हें म्यांमार के जंगलों में प्रशिक्षण शिविर चलाने के लिए वित्तीय मदद कहां से मिल रही थी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एनआईए को व्यापक पूछताछ और डिजिटल उपकरणों की फारेंसिक जांच करने की अनुमति दे दी है, जिससे आने वाले दिनों में कई बड़े और चौंकाने वाले खुलासे होने की उम्मीद है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (विशेषकर मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड) की सीमाएं म्यांमार के साथ लगती हैं, और वहां पिछले कुछ वर्षों से लगातार अशांति का माहौल बना हुआ है। म्यांमार के विद्रोही समूहों द्वारा जिस तरह से उन्नत ड्रोन तकनीक और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सेना की चिंता को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। यदि विदेशी प्रशिक्षकों द्वारा ऐसे विद्रोही गुटों को आधुनिक युद्ध कौशल में पारंगत किया जाता है, तो उसका सीधा खतरा भारतीय सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा पर मंडराने लगता है। एनआईए इसी सुराग को तलाश रही है कि क्या इन ट्रेनिंग कैंपों की पहुंच या इनके द्वारा प्रशिक्षित लोग भारतीय उग्रवादी संगठनों के भी संपर्क में थे या नहीं। भारत सरकार ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर हमेशा से ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है और इस मामले में किसी भी विदेशी साजिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
एक अमेरिकी नागरिक के खिलाफ भारत में इस प्रकार का गंभीर आपराधिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला चलना और उसका एनआईए कोर्ट में पेश होना द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से भी एक बड़ा मोड़ है। अमेरिकी दूतावास और मानवाधिकार संगठनों की इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनी हुई है, लेकिन भारतीय जांच एजेंसियों ने स्पष्ट कर दिया है कि देश की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा से समझौता करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून के कटघरे में खड़ा किया जाएगा। आने वाले हफ्तों में इस मामले की सुनवाई जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, म्यांमार के जंगलों में चल रहे गुप्त सैन्य शिविरों और ड्रोन नेटवर्क के कई और गहरे राज से पर्दा उठेगा, जो दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
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