
कभी अपने देश में 'इंडिया आउट' (India Out) जैसे भारत विरोधी राजनीतिक अभियानों और बयानों से भू-राजनीति में सुर्खियां बटोरने वाले मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू अब एक बिल्कुल अलग ही तेवर में नजर आ रहे हैं। अपनी हालिया पाकिस्तान यात्रा के दौरान इस्लामाबाद में खड़े होकर मुइज्जू ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क (SAARC) शिखर सम्मेलन को फिर से आयोजित करने और उसमें नई जान फूंकने की पुरजोर वकालत की है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ साझा मंच साझा करते हुए मालदीव के राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब कूटनीतिक गलियारों में इसे एक बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है। एक तरफ जहां मुइज्जू प्रशासन ने पूर्व में भारत के साथ रणनीतिक और सैन्य सहयोग को कम करने की कोशिशें की थीं, वहीं अब पाकिस्तान की धरती से क्षेत्रीय मंच को पुनर्जीवित करने का उनका यह आह्वान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा का विषय बन गया है।
इस हाई-प्रोफाइल दौरे के दौरान मालदीव और पाकिस्तान के बीच आपसी कूटनीतिक और द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाने की कवायद भी देखने को मिली है। इस्लामाबाद में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई द्विपक्षीय बैठकों के बाद रक्षा, समुद्री सुरक्षा (Maritime Security) और व्यापार समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े करीब 20 महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर मुहर लगाई गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मालदीव के साथ व्यापारिक रिश्तों को दस गुना से अधिक बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। विश्लेषकों का मानना है कि एक तरफ आर्थिक संकट और वित्तीय मोर्चे पर जूझ रहे मालदीव को भारत से लगातार आर्थिक मदद और करेंसी स्वैप रोलओवर जैसी राहतें मिल रही हैं, तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी धमक बनाए रखने के लिए मुइज्जू द्वारा इस तरह पाकिस्तान की जमीन से सार्क का राग अलापना कूटनीतिक संतुलन साधने की एक सोची-समझी चाल भी हो सकती है।
भारत विरोधी छवि से क्षेत्रीय कूटनीति तक का सफर
मालदीव की सत्ता संभालने के बाद से ही राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की नीतियां मुख्य रूप से भारत से दूरी बनाने और चीन के करीब जाने की रही हैं। उनके चुनाव प्रचार का मुख्य आधार ही 'इंडिया आउट' कैंपेन था, जिसके तहत उन्होंने भारतीय सैन्य कर्मियों को मालदीव से बाहर भेजने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। हालांकि, कूटनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं ने जल्द ही उनकी प्राथमिकताओं को बदला है। भारत ने हमेशा 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighborhood First) की नीति के तहत मालदीव को हर संभव मानवीय और आर्थिक सहायता प्रदान की है, जिसमें हाल ही में अरबों रुपये के वित्तीय सहयोग और करेंसी स्वैप की सुविधाएं शामिल हैं। इसके बावजूद, मुइज्जू का पाकिस्तान का आधिकारिक दौरा करना और वहां पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ की मौजूदगी में सार्क शिखर सम्मेलन की बहाली की मांग दोहराना यह दर्शाता है कि माले अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने की कोशिश कर रहा है, भले ही इसके कूटनीतिक निहितार्थ कुछ भी हों।
SAARC के मंच पर भारत और पाकिस्तान के बीच जमी बर्फ
सार्क (SAARC) सम्मेलन पिछले काफी समय से निष्क्रिय अवस्था में पड़ा हुआ है क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकवाद और द्विपक्षीय तनाव के चलते इसके सम्मेलनों पर अनिश्चितता के बादल छाए रहे हैं। साल 2016 के बाद से कोई भी सार्क शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं किया जा सका है क्योंकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पार आतंकवाद और कूटनीतिक बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। ऐसे संवेदनशील माहौल में पाकिस्तान की यात्रा पर गए मोहम्मद मुइज्जू द्वारा सार्क को पुनर्जीवित करने की बात करना मुख्य रूप से पाकिस्तान की कूटनीतिक प्राथमिकताओं के अनुकूल प्रतीत होता है। पाकिस्तान लंबे समय से यह प्रयास करता रहा है कि किसी तरह सार्क के बहाშ भारत के साथ बहुपक्षीय मंचों पर उसकी सक्रियता दिखे, लेकिन नई दिल्ली का रुख इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट और अडिग रहा है।
बदलती क्षेत्रीय आबोहवा और भविष्य के कूटनीतिक समीकरण
मुइज्जू की यह पाकिस्तान यात्रा और वहां दिए गए उनके बयान दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति की एक नई तस्वीर पेश करते हैं। एक तरफ जहां द्वीपीय देश मालदीव अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए वैश्विक मदद और निवेश के नए रास्ते तलाश रहा है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संगठनों के जरिए खुद को कूटनीति के केंद्र में रखना चाहता है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि भारत के सामरिक प्रभाव वाले हिंद महासागर क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ इस प्रकार की नजदीकी और समझौतों से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर गहरा असर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत मालदीव के राष्ट्रपति के इन नए बयानों और पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों को किस रूप में देखता है, क्योंकि दक्षिण एशिया में सुरक्षा और स्थिरता के लिहाज से भारत की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है।
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