
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर कूटनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। पड़ोसी देश बांग्लादेश की सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री तारिक रहमान की विदेश नीतियों और प्राथमिकताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कयासों का दौर शुरू हो गया है। भारत सरकार द्वारा द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और आपसी सद्भाव का संदेश देते हुए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को भारत की आधिकारिक यात्रा का गर्मजोशी से न्योता भेजा गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नई दिल्ली के इस औपचारिक आमंत्रण पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री की तरफ से अभी तक कोई भी स्पष्ट प्रतिक्रिया या स्वीकृति सामने नहीं आई है, जिससे भारत यात्रा पर रहस्य के बादल मंडरा रहे हैं। इसके विपरीत, तारिक रहमान ने सऊदी अरब, तुर्की और पूर्वी एशिया के प्रमुख देश जापान के आधिकारिक दौरों पर जाने का पूरा कार्यक्रम तय कर लिया है और इन देशों की यात्राओं को लेकर हरी झंडी भी दे दी है। नई दिल्ली के निमंत्रण पर चुप्पी साधे रखना और अन्य देशों के दौरों को प्राथमिकता देना कूटनीतिक जानकारों के बीच गंभीर चर्चा और मंथन का विषय बन चुका है, जिससे दोनों पड़ोसी देशों के बीच भविष्य के रिश्तों की दिशा पर सवाल उठने लगे हैं।
भारत का खुला आमंत्रण और द्विपक्षीय रिश्तों की नई कूटनीतिक चाल
भारत हमेशा से अपने पड़ोसियों के साथ ‘पड़ोसी पहले’ (Neighbourhood First) की नीति के तहत सौहार्दपूर्ण और मजबूत संबंध बनाए रखने का पक्षधर रहा है। जब बांग्लादेश में राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव आया और तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली, तो नई दिल्ली ने कूटनीतिक शिष्टाचार निभाते हुए उन्हें भारत आने का आधिकारिक और खुला निमंत्रण भेजा। इस आमंत्रण का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और सांस्कृतिक साझेदारियों को और अधिक ऊंचाई पर ले जाना था। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि बांग्लादेश की घरेलू राजनीति और वहां के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों के दबाव के चलते तारिक रहमान फिलहाल भारत के साथ अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में जुड़ने से कतरा रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि बांग्लादेश के कई नेता घरेलू राजनीति में अपनी छवि और राजनीतिक जमीन को साधने के लिए अक्सर भारत के प्रति एक सधा हुआ और दूरी बनाए रखने वाला रुख अपनाते हैं, ताकि कट्टरपंथी या भारत-विरोधी तत्वों को तुष्ट किया जा सके। नई दिल्ली के न्योते पर यह लंबी चुप्पी इसी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा मानी जा रही है।
सऊदी अरब, तुर्की और जापान की यात्राओं को प्राथमिकता क्यों दे रहे हैं तारिक रहमान?
एक तरफ जहां भारत के न्योते पर रहस्यमयी चुप्पी छाई हुई है, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश के प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह पुष्टि कर दी है कि तारिक रहमान अपने शुरुआती विदेश दौरों में सऊदी अरब, तुर्की और जापान की यात्रा करेंगे। कूटनीतिक दृष्टिकोण से इन तीनों देशों का चयन बहुत ही सोचे-समझें राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों के तहत किया गया है। सऊदी अरब और तुर्की जैसे इस्लामिक देशों के साथ मजबूत संबंध रखना बांग्लादेश के धार्मिक और घरेलू राजनीतिक हलकों में एक बड़ा सकारात्मक संदेश देता है, खासकर तब जब देश में कंजर्वेटिव और दक्षिणपंथी ताकतों का प्रभाव काफी मजबूत हो। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों बांग्लादेशी प्रवासी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जिनसे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (Remittances) प्राप्त होती है। दूसरी ओर, जापान का दौरा आर्थिक निवेश, तकनीकी सहयोग, और बड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि जापान बांग्लादेश के सबसे बड़े द्विपक्षीय विकास साझीदारों में से एक है। इन देशों के जरिए तारिक रहमान अपनी सरकार के लिए भारी वित्तीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की जुगत में लगे हुए हैं, जो उन्हें घरेलू मोर्चे पर मजबूत राजनीतिक स्थिरता प्रदान कर सके।
नई दिल्ली और ढाका के बीच रणनीतिक अविश्वास और भविष्य की चुनौतियां
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा और आतंकवाद के खात्मे के मोर्चे पर बेहद शानदार दौर से गुजरे हैं, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद से ओtarva (ढाका) के रुख में आया यह बदलाव दोनों देशों के बीच रणनीतिक अविश्वास की परतें खोल रहा है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और सीमा पार उग्रवाद पर लगाम लगाने के लिए ढाका का सहयोग बेहद जरूरी होता है। यदि बांग्लादेश का नया नेतृत्व भारत विरोधी ताकतों या बाहरी ताकतों के प्रभाव में आकर नई दिल्ली से दूरी बनाने की कोशिश करता है, तो इससे द्विपक्षीय व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। भारतीय सामरिक विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद पैनी नजर बनाए हुए हैं। उनका मानना है कि भारत को कूटनीतिक धैर्य का परिचय देते हुए बांग्लादेश के नए प्रशासन के साथ संवाद बनाए रखना चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या तारिक रहमान अपनी विदेश नीति में भारत को उचित प्राथमिकता देते हैं या फिर क्षेत्रीय समीकरणों में दूरियां और अधिक बढ़ जाती हैं।
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