पाकिस्तान और तुर्की को मिडिल ईस्ट में घुसने नहीं देगा इजरायल

मध्य पूर्व यानी मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में इन दिनों सनसनी मची हुई है। हाल ही में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए बहुचर्चित 'मक्का डिफेंस पैक्ट' (Mecca Defense Pact) को लेकर एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। इस बीच, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के एक बेहद करीबी और रक्षा मामलों के रणनीतिकार ने इस तथाकथित इस्लामिक सैन्य गठबंधन के उन अंदरूनी राज़ों से पर्दा उठा दिया है, जिन्हें अब तक बेहद गोपनीय रखा गया था। इस खुलासे के बाद से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि कागजों पर भले ही इस समझौते को एक सुरक्षा कवच के रूप में दिखाया जा रहा हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि इजरायल ने अपनी रक्षा नीति और सामरिक क्षमता के बल पर पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों के लिए मिडिल ईस्ट में अपने रणनीतिक पैर पसारना नामुमकिन कर दिया है। इजरायली खुफिया और सैन्य तंत्र ने साफ कर दिया है कि वे अपनी सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे और इस क्षेत्र में किसी भी बाहरी या संदिग्ध दखल को तुरंत नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा।

मक्का पैक्ट की असलियत और अंदरूनी कमजोरियां

जब इसी साल अगस्त के महीने में सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, तो इसे दुनिया भर के मीडिया में एक बहुत बड़े इस्लामिक सैन्य गठबंधन के रूप में पेश किया गया था। इस समझौते का खाका कुछ इस तरह तैयार किया गया था कि सऊदी अरब अपनी आर्थिक ताकत और फंड झोंकेगा, तुर्की अपनी आधुनिक ड्रोन तकनीक और नाटो जैसी सैन्य क्षमता का लाभ देगा, जबकि पाकिस्तान अपनी फौज और परमाणु ताकत का धौंस जमाएगा। इस पैक्ट के अनुच्छेद कुछ इस तरह बनाए गए थे कि यदि किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा, जो कि ठीक नाटो के अनुच्छेद-5 की तर्ज पर है।

लेकिन, पाकिस्तान के हुक्मरानों और मुनीर के करीबी माने जाने वाले विश्लेषकों की हालिया अंदरूनी रिपोर्टों ने इस पैक्ट की हवा निकाल दी है। इस पोल-खोल रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि यह समझौता अंदर से खोखला है क्योंकि तीनों देशों के भू-राजनीतिक हित, प्राथमिकताएं और सीमाएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। जहां एक ओर सऊदी अरब अपने 'विजन 2030' के तहत आर्थिक समृद्धि और स्थिरता चाहता है, वहीं तुर्की अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को साधने में लगा है। इसके विपरीत, आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान इस गठबंधन के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और फंड हासिल करने की जुगत में है। इस अंतर्विरोध के कारण मक्का पैक्ट जमीन पर असरदार साबित होने से पहले ही आंतरिक खींचतान का शिकार होने लगा है।

इजरायल की आक्रामक रणनीति और तेल अवीव की दो टूक चेतावनी

मक्का पैक्ट के साए में पल रहे मंसूबों पर सबसे बड़ा पानी इजरायल की सुरक्षा नीति ने फेर दिया है। तेल अवीव की सरकार और रक्षा बलों (IDF) ने पश्चिमी एशिया में अपनी पैठ को लेकर बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया है। इजरायल का मानना है कि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की नीतियों और पाकिस्तानी फौज की कट्टरपंथी मानसिकता का मेल मिडिल ईस्ट की शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। यही वजह है कि इजरायल ने सुरक्षा के मोर्चे पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत कर ली है। इजरायली रक्षा प्रतिष्ठान ने साफ कर दिया है कि वे अपनी सीमाओं के नजदीक या खाड़ी देशों की आड़ में पाकिस्तान और तुर्की को पैर जमाने की कोई गुंजाइश नहीं देंगे।

इजरायल की अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस प्रणाली, सुदृढ़ खुफिया एजेंसी मोसाद और उसकी आक्रामक सैन्य क्षमता से मिडिल ईस्ट के तमाम देश अच्छी तरह वाकिफ हैं। इजरायल ने कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस तथाकथित रक्षा समझौते के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले या अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व खाड़ी क्षेत्र में अपनी दखलअंदाजी बढ़ाने की कोशिश करेंगे, तो इजरायल की सेना बिना एक पल गंवाए इसका मुंहतोड़ जवाब देगी। इजरायल के इस रुख ने साफ कर दिया है कि वह मध्य पूर्व में किसी भी नए शक्ति संतुलन को अपने सुरक्षा घेरे को भेदने नहीं देगा, फिर चाहे उसमें कितने भी देश क्यों न शामिल हो जाएं।

क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव और भारत के लिए रणनीतिक बढ़त

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय संतुलन पर इसका असर है। मक्का पैक्ट के अस्तित्व में आने के बाद से एशिया और मध्य पूर्व के देशों के बीच नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान और तुर्की इस समझौते के जरिए खुद को इस्लामिक दुनिया के ठेकेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार हो रहे हमलों और ईरान के साथ बदलते हालातों ने इस पैक्ट की पोल खोलकर रख दी है। समझौते के कुछ ही समय बाद सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया कि यह कागजी डिफेंस पैक्ट सऊदी धरती की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

भारत के सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह स्थिति काफी हद तक नई रणनीतिक संभावनाएं खोलती है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत विरोधी ताकतों द्वारा रचे जाने वाले ऐसे कूटनीतिक षड्यंत्रों के बावजूद, सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देश अपनी आर्थिक और ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत जैसे विशाल और स्थिर बाजार को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। इजरायल के साथ भारत के गहरे और भरोसेमंद सामरिक संबंध इस बात की गारंटी देते हैं कि इस क्षेत्र में आतंकवाद और उग्रवाद का समर्थन करने वाली ताकतों को हावी नहीं होने दिया जाएगा। मुनीर के करीबी द्वारा खोली गई इस पोल ने यह साबित कर दिया है कि खोखले समझौतों और बड़प्पन के दावों से न तो मिडिल ईस्ट बदला जा सकता है और न ही इजरायल जैसी महाशक्ति को चुनौती दी जा सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कागजों पर सिमटा यह मक्का पैक्ट क्षेत्रीय राजनीति के थपेड़ों के बीच कब तक टिक पाता है।

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