भारत के साथ सीमा विवाद (Border Dispute) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों और तीसरे देशों के पास जाने की गीदड़भभकी देने वाले पड़ोसी देश नेपाल (Nepal) के सुर अब पूरी तरह से बदल चुके हैं। पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह (बालेंद्र शाह) द्वारा चीन और ब्रिटेन को इस विवाद में घसीटने के बाद, भारत के कड़े राजनयिक रुख और घुड़की के आगे अंततः नेपाल को झुकना पड़ा है।
नेपाल की सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर मान लिया है कि भारत के साथ उसका सीमा विवाद पूरी तरह से एक द्विपक्षीय (Bilateral) मामला है और इसमें किसी भी तीसरे देश या पक्ष (Third Party) के हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं है। नेपाल के विदेश मंत्री ने देश की संसद में खड़े होकर इस मामले पर अपनी सरकार की ओर से डैमेज कंट्रोल करते हुए बड़ी सफाई पेश की है।
नेपाली संसद में विदेश मंत्री शिशिर खनाल का यू-टर्न
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह के विवादित बयान से उपजे तनाव को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने बेहद सधे हुए शब्दों में कहा:
नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल का बयान: “मैं इस सम्मानित सदन के सामने यह पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं कि नेपाल-भारत सीमा विवाद विशुद्ध रूप से एक द्विपक्षीय मुद्दा है। नेपाल हमेशा से इस समस्या को किसी तीसरे देश के पास ले जाने के बजाय, दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक समझौतों के आधार पर आपसी बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने का पक्षधर रहा है।”
विवाद पर दी अजीब सफाई: विदेश मंत्री खनाल ने अपने प्रधानमंत्री के बयान का बचाव करते हुए एक अजीबोगरीब दलील दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बालेन शाह का इरादा किसी तीसरे पक्ष से मध्यस्थता (Mediation) कराने का बिल्कुल नहीं था। उनके कहने का मतलब सिर्फ यह था कि यदि चीन या ब्रिटेन के पास ऐतिहासिक ‘सुगौली संधि’ (Treaty of Sugauli) के दौर के कुछ पुराने नक्शे या दस्तावेज उपलब्ध हों, तो नेपाल केवल तकनीकी प्रक्रिया और साक्ष्य जुटाने के लिए उनकी मदद ले सकता है।
क्या था प्रधानमंत्री बालेन शाह का वह विवादित बयान?
बीते महीने नेपाली पीएम बालेन शाह ने संसद में एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर भारत को उकसाने की कोशिश की थी। उन्होंने संसद में कहा था:
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दोनों तरफ से अतिक्रमण का दावा: “आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण (Tresspass) नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारत के क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया हुआ है। अब समय आ गया है कि दोनों देश एक साथ बैठें और तथ्यों की जांच कर इस मुद्दे को हल करें।”
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चीन-ब्रिटेन से चर्चा की बात: शाह ने दावा किया था कि काठमांडू ने इस मुद्दे को लेकर चीन और ब्रिटेन के साथ राजनयिक चर्चा शुरू कर दी है। उन्होंने ब्रिटेन का जिक्र इसलिए किया था क्योंकि भारत-नेपाल की सीमाओं का निर्धारण ब्रिटिश काल के दौरान ही हुआ था। उनके इस बयान की खुद नेपाल के भीतर और भारत में तीखी आलोचना हुई थी।
भारत ने सीमा विवाद पर क्या दिया था करारा जवाब?
नेपाली प्रधानमंत्री के इस बयान पर भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने बेहद कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। भारत ने स्पष्ट शब्दों में नेपाल को समझा दिया था कि इस मामले में किसी भी तीसरे देश की टांग अड़ाना भारत कतई बर्दाश्त नहीं करेगा।
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कालापानी और लिपुलेख पर रुख: नेपाल और भारत के बीच मुख्य विवाद लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्रों को लेकर है। नेपाल ने कुछ समय पहले अपने नए राजनीतिक नक्शे में इन क्षेत्रों को अपना दिखाया था। हालांकि, भारत ने हमेशा साफ किया है कि ये सभी क्षेत्र ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से भारत के उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा हैं।
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98% सीमा तय, नदी के कारण है विवाद: भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि भारत और नेपाल के बीच लगभग 98 प्रतिशत सीमा का निर्धारण शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हो चुका है। जो 2 प्रतिशत हिस्सा अनसुलझा है, वह मुख्य रूप से गंडक और अन्य हिमालयी नदियों के समय-समय पर अपना मार्ग (रास्ता) बदलने के कारण पैदा हुआ है, जिसे आपसी बातचीत से सुलझाया जा रहा है। भारत के इसी सख्त रवैये को भांपते हुए अब नेपाल ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।
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