
भारतीय कूटनीति और विदेश नीति के मोर्चे पर पिछले कुछ महीनों से वैश्विक स्तर पर चल रहे समीकरणों के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका की धरती से बहुत ही स्पष्ट, कड़े और दो टूक शब्दों में अपनी बात रखी है। अमेरिका के अपने आधिकारिक दौरे के दौरान न्यूयॉर्क में ‘एशिया सोसायटी’ (Asia Society) द्वारा आयोजित एक उच्च स्तरीय कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने भारत और अमेरिका के बीच पिछले डेढ़ वर्षों से द्विपक्षीय रिश्तों में आ रहे तनाव और असहजता पर खुलकर अपनी राय रखी।
एस. जयशंकर ने अपने संबोधन में मुख्य रूप से दो सबसे बड़े और संवेदनशील मुद्दों—व्यापारिक मतभेदों (Trade Differences) और पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद (Cross-Border Terrorism)—पर भारत के दृष्टिकोण को बेहद दृढ़ता के साथ दुनिया के सामने रखा। उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व और पश्चिमी देशों को स्पष्ट संदेश दिया कि यदि रणनीतिक साझेदार देश भारत की सुरक्षा और प्राथमिक संवेदनाओं का सम्मान नहीं करते हैं, तो इसका सीधा असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की गहराई पर पड़ेगा।
आतंकवाद के मुद्दे को भारत के लिए सबसे सर्वोच्च और संवेदनशील प्राथमिकता करार देते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि दुनिया में ऐसे बहुत ही कम देश होंगे जिन्होंने अपने पड़ोसी राष्ट्र की ओर से प्रायोजित और जान-बूझकर पोषित आतंकवाद को उस हद तक झेला है, जितना भारत ने भुगता है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “एक-दूसरे की संवेदनाओं का ख्याल रखना किसी भी मजबूत साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। आतंकवाद एक ऐसा मुद्दा है जो हमारे लिए अत्यंत संवेदनशील है। जो विषय हमारे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के लिए इतना महत्वपूर्ण है, यदि कोई हमारा साझेदार देश हमारी इन प्रमुख चिंताओं और चेतावनियों का पर्याप्त ख्याल नहीं रखता है, तो यह स्वाभाविक है कि इसका नकारात्मक असर हमारे द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा।” जानकारों का मानना है कि विदेश मंत्री का यह बयान परोक्ष रूप से अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा पाकिस्तान के साथ बढ़ रहे सैन्य व कूटनीतिक मेल-मिलाप पर भारत की गहरी असहमति और चिंता को दर्शाता है।
विदेश मंत्री का यह तीखा और स्पष्ट बयान इसलिए भी अत्यधिक सामयिक और महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर नज़दीकियां बढ़ती हुई दिखाई दी हैं। हाल के वर्षों में वाशिंगटन द्वारा उठाए गए कुछ कदमों, जैसे कि ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के दावे और अमेरिकी व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का स्वागत किया जाना, ने नई दिल्ली में रणनीतिक हलकों को असहज किया है।
भारत इन घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से देखता रहा है, लेकिन अब तक सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की मुखर प्रतिक्रिया देने से परहेज करता रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की भारत की कूटनीति को हाल के दिनों में तब धक्का लगता दिखा जब अमेरिका के साथ-साथ कई प्रमुख यूरोपीय देशों ने भी पाकिस्तान के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों को दोबारा पटरी पर लाना शुरू कर दिया। नई दिल्ली की सबसे बड़ी आशंका यह है कि पश्चिमी देशों के इस नरम रुख का फायदा उठाकर पाकिस्तान एक बार फिर अपनी पुरानी हरकतों यानी सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने की गुंजाइश तलाश सकता है।
केवल सुरक्षा और आतंकवाद ही नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौतों (Trade Deals) के पेंच पर भी विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने देश के आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं में भारत अपने घरेलू हितों, छोटे उत्पादकों, लघु उद्योगों और कृषि क्षेत्र से जुड़े किसानों के अधिकारों से किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हट सकता।
जयशंकर ने स्वीकार किया कि भारत और अमेरिका की आर्थिक संरचना में बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने समझाया, “हमें इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि भारत मुख्य रूप से छोटे उत्पादकों, छोटे कृषि उत्पादकों और छोटी फैक्ट्रियों व कुटीर उद्योगों का एक विशाल समाज है। भारत और अमेरिका के बीच प्रति व्यक्ति आय का भारी अंतर होने के अलावा उत्पादन का स्वरूप और हमारे सामाजिक-आर्थिक ढांचे की प्रकृति भी पूरी तरह भिन्न है।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में इसलिए देरी हुई क्योंकि जमीनी हकीकत की जटिलताएं बहुत गहरी थीं, और अब इस दिशा में अमेरिकी कानून की धारा 301 (Section 301) की प्रक्रिया के तहत आगे की रूपरेखा तय की जा रही है।
इस बीच, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के भी अमेरिका दौरे पर होने की खबर है, जहां वे मिलवाकी में जी-20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे और दोनों देशों के बीच अटके अंतरिम व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी समकक्षों के साथ उच्च स्तरीय वार्ता करेंगे। विदेश मंत्री के इस स्पष्ट और दो टूक संदेश ने यह साबित कर दिया है कि नया भारत अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और आर्थिक संप्रभुता के मामले में अपने मित्रों और साझेदारों से भी स्पष्ट संवाद करने से पीछे नहीं हटता है।
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