
अमेरिका से इस वक्त की बेहद चिंताजनक और बड़ी खबर सामने आ रही है, जिसने वहां नौकरी कर रहे लाखों विदेशी नागरिकों खासकर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की नींद उड़ा दी है। अमरीकी प्रशासन ने एच-1बी (H-1B) और अन्य वर्क वीजा धारकों के लिए मिलने वाली 540 दिनों की उस राहत को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया है जिसके तहत वीजा रिन्यूअल (Visa Renewal) पेंडिंग रहने पर भी उन्हें बिना किसी रुकावट के काम करने की अनुमति मिलती थी। इस अचानक और कड़े फैसले से अमेरिका की तकनीकी कंपनियों और वहां कार्यरत भारतीय कर्मचारियों के बीच भारी हड़कंप मच गया है। अब वीजा विस्तार की प्रक्रिया में देरी होने पर प्रोफेशनल्स को कानूनी रूप से नौकरी छोड़ने या देश छोड़ने का बड़ा जोखिम उठाना पड़ सकता है, जिससे अमरीकी कॉर्पोरेट जगत में भी गहरी चिंता छा गई है।
ऑटोमैटिक वर्क परमिट विस्तार के खत्म होने का क्या है पूरा मामला?
कोविड महामारी और उसके बाद प्रशासनिक बैकलॉग के दौरान अमरीकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) ने एच-1बी और अन्य रोजगार आधारित वीजा के नवीनीकरण के आवेदनों में हो रही भारी देरी को देखते हुए एक बड़ी राहत दी थी। इस नियम के तहत यदि किसी कर्मचारी के वीजा विस्तार का आवेदन समय पर लंबित (Pending) रहता था, तो उसका वर्क परमिट स्वतः ही 540 दिनों के लिए आगे बढ़ जाता था, जिससे कर्मचारी बिना किसी व्यवधान के अपनी नौकरी जारी रख सकते थे। अब इस उदार व्यवस्था को पूरी तरह से वापस ले लिया गया है या इसके नियमों को बेहद सख्त कर दिया गया है, जिसका सीधा मतलब यह है कि अब आवेदनों के बैकलॉग के दौरान कर्मचारियों को स्वतः कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी और कागजी प्रक्रिया पूरी होने तक उनके रोजगार पर तलवार लटकी रहेगी।
सबसे बड़ा झटका: अमेरिका में बसे लाखों भारतीय टेक प्रोफेशनल्स पर मंडराया संकट
अमरीकी टेक इंडस्ट्री में काम करने वाले कुल वर्क वीजा धारकों में से सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों का है, जो सिलिकॉन वैली से लेकर न्यूयॉर्क तक अपनी तकनीकी का लोहा मनवा रहे हैं। इस नए और सख्त फैसले का सबसे घातक असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, डेटा वैज्ञानिकों और उनके परिवारों पर पड़ने वाला है। वीजा रिन्यूअल की फाइलों के अटकने पर यदि समय पर अप्रूवल नहीं मिलता है, तो उन्हें न सिर्फ अपनी नौकरी गंवानी पड़ सकती है बल्कि उनके वैध कानूनी प्रवास पर भी संकट खड़ा हो जाएगा। बच्चों के स्कूल, होम लोन और परिवार के भविष्य की प्लानिंग को लेकर भारतीय समुदाय के बीच इस समय तनाव का माहौल है, क्योंकि अमेरिकी आव्रजन नीतियों में हो रहे इन बदलावों ने उनकी स्थिरता को हिला कर रख दिया है।
अमरीकी कंपनियों और टेक सेक्टर में लेबर शॉर्टेज और चिंता का माहौल
इस कड़े फैसले से केवल कर्मचारी ही नहीं बल्कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन और अन्य तमाम बड़ी अमरीकी टेक कंपनियां भी बेहद परेशान हैं। इन कंपनियों का मुख्य कामकाज दुनिया भर से लाए गए कुशल प्रतिभाओं यानी टैलेंट पर निर्भर करता है, और यदि वीजा नियमों की उलझनों के कारण अनुभवी भारतीय इंजीनियरों को अचानक देश छोड़ना पड़ा, तो प्रोजेक्ट्स बुरी तरह प्रभावित होंगे। टेक इंडस्ट्री के जानकारों और लॉबिंग समूहों का कहना है कि इस तरह के फैसलों से अमरीकी कंपनियों की ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस कमजोर होगी और वे दूसरे देशों के मुकाबले पिछड़ सकती हैं। कंपनियों का मानना है कि प्रशासनिक देरी के लिए कर्मचारियों या नियोक्ताओं को सजा देना पूरी तरह अनुचित है, जिससे अमरीकी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंच सकता है।
आगे क्या होगा और प्रभावित प्रोफेशनल्स के पास क्या हैं विकल्प?
इस गंभीर स्थिति के पैदा होने के बाद अमरीकी इमिग्रेशन वकीलों और एच-1बी धारकों ने अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से काम करना शुरू कर दिया है। वकीलों की सलाह है कि कर्मचारी अपने वीजा रिन्यूअल के कागजात तय समय सीमा से कई महीने पहले ही फाइल कर दें ताकि किसी भी प्रकार के प्रशासनिक बैकलॉग से बचा जा सके। इसके अलावा प्रभावित प्रोफेशनल्स और कंपनियां वाशिंगटन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही हैं ताकि इस नीति में कुछ नरमी बरती जाए या कोई वैकल्पिक समाधान निकाला जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमरीकी राजनीति और आव्रजन सुधारों के केंद्र में आने की पूरी संभावना है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
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