
मानसून का आगमन जहां प्रकृति को नया जीवन देता है और झुलसती गर्मी व उमस से राहत दिलाता है, वहीं यह मौसम सेहत के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। सनातन आयुर्वेद शास्त्र में वर्षा ऋतु को ‘वर्षा ऋतुचर्या’ के अंतर्गत विशेष रूप से वर्णित किया गया है। महर्षि चरक और वाग्भट्ट जैसे महान आचार्यों के अनुसार, बारिश के मौसम में वातावरण में नमी, हवा में ठंडक और जल की प्रकृति में बदलाव के कारण मानव शरीर में ‘जठराग्नि’ (पाचन अग्नि) अत्यधिक मंद हो जाती है। इसके साथ ही, इस मौसम में प्राकृतिक रूप से ‘वात दोष’ का प्रकोप बढ़ता है और ‘पित्त दोष’ का संचय होने लगता है। जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और पाचन शक्ति कमजोर होती है, तब छोटी-छोटी अज्ञानता या लापरवाही भी बड़ी बीमारियों का रूप ले लेती हैं। अक्सर लोग मानसून के दौरान अपनी खान-पान और दिनचर्या से जुड़ी पुरानी आदतों को ही दोहराते रहते हैं, जो आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार सर्वथा वर्जित हैं। यदि आप बारिश के दिनों में अस्पताल के चक्कर काटने से बचना चाहते हैं और खुद को ऊर्जावान रखना चाहते हैं, तो आयुर्वेद में बताई गई इन 4 बड़ी गलतियों से तुरंत दूरी बना लें।
1. दिन में सोना (दिवास्वप्न) – कमजोर पाचन अग्नि और कफ-पित्त असंतुलन का मुख्य कारण
आयुर्वेद में ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) को छोड़कर अन्य अधिकांश ऋतुओं में दिन में सोने यानी ‘दिवास्वप्न’ को सेहत के लिए अत्यंत हानिकारक माना गया है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु में दिन के समय सोना बीमारियों को सीधा निमंत्रण देने जैसा है। आयुर्वेद के अनुसार, मानसून में जब वातावरण में आर्द्रता (Humidity) अधिक होती है, तब शरीर की जठराग्नि पहले से ही ‘मंद’ (सुस्त) स्थिति में होती है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति दोपहर के समय या भारी खाना खाने के तुरंत बाद सो जाता है, तो शरीर में ‘कफ’ और ‘पित्त’ दोष का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। दिन में सोने से मेटाबॉलिज्म बेहद धीमा हो जाता है, जिससे भोजन सही तरीके से पच नहीं पाता और आंतों में ‘आम’ यानी विषाक्त पदार्थों (Toxins) का निर्माण होने लगता है। यह ‘आम रस’ ही शरीर के विभिन्न स्रोतों (Srotas) को अवरुद्ध कर देता है, जिससे पेट में भारीपन, अपच, सुस्ती, त्वचा रोग (मुंहासे, दाद, खुजली) और यकृत (लीवर) से जुड़ी समस्याएं पैदा होती हैं। इसलिए बारिश के दिनों में दोपहर में सोने के बजाय हल्की वॉक करें या खुद को मानसिक व शारीरिक रूप से सक्रिय रखें।
2. कच्चा खाना, बासी भोजन और हरी पत्तेदार सब्जियों का अत्यधिक सेवन – पेट की बीमारियों की जड़
सामान्य दिनों में हरी पत्तेदार सब्जियां और कच्चा सलाद सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में इनका सेवन वर्जित या बेहद सीमित करने का निर्देश दिया गया है। आचार्यों के अनुसार, मानसून के दौरान हवा और मिट्टी में नमी के कारण हरी सब्जियों (जैसे पालक, मेथी, चौलाई, पत्तागोभी) पर सूक्ष्म कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं। इसके अलावा, बारिश में उगने वाली सब्जियों में वात बढ़ाने वाले गुण अधिक होते हैं। जब मंद जठराग्नि वाले शरीर में कच्चा सलाद, कच्ची सब्जियां या बासी भोजन जाता है, तो पाचन तंत्र उसे पचाने में असमर्थ हो जाता है। इससे दस्त, उल्टी, पेट में मरोड़, गैस, एसिडिटी और फूड पॉइज़निंग जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। आयुर्वेद के अनुसार बारिश के दिनों में हमेशा अच्छी तरह पका हुआ, गरमा-गरम, सुपाच्य और सात्विक भोजन ही करना चाहिए। भोजन में अदरक, हींग, अजवाइन, काला नमक, जीरा और काली मिर्च जैसे पाचक मसालों का प्रयोग अवश्य करें ताकि जठराग्नि प्रदीप्त रहे।
3. अत्यधिक शारीरिक श्रम और भारी वर्कआउट – कुपित वात दोष को और अधिक बढ़ाता है
आजकल जिम जाने वाले लोग और फिटनेस फ्रीक हर मौसम में एक जैसा ही कड़ा वर्कआउट या भारी व्यायाम करते हैं, जो कि आयुर्वेद के दृष्टिकोण से मानसून में हानिकारक हो सकता है। अष्टांग हृदयम् के अनुसार, वर्षा ऋतु में मनुष्य की शारीरिक शक्ति और बल स्वाभाविक रूप से न्यूनतम (कमजोर) स्तर पर होता है। इस मौसम में शरीर में ‘वात दोष’ का प्रकोप पहले से ही अपने चरम पर होता है। यदि ऐसे में कोई व्यक्ति अत्यधिक शारीरिक श्रम, बहुत भारी वजन उठाना, तेज दौड़ना या कठोर व्यायाम करता है, तो शरीर में वात दोष और अधिक कुपित (उत्तेजित) हो जाता है। वात दोष के बिगड़ने से जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव, शारीरिक थकावट, अनिद्रा, नसों में जकड़न और इम्युनिटी में भारी गिरावट आने लगती है। इसलिए आयुर्वेद सलाह देता है कि बारिश के दिनों में केवल ‘अर्धशक्ति’ (अपनी क्षमता का आधा) ही व्यायाम करें। भारी जिम वर्कआउट के बजाय हल्का योग, प्राणायाम, अनुलोम-विलोम और स्ट्रेचिंग करना शरीर के लिए अधिक लाभप्रद और सुरक्षित होता है।
4. उबले बिना पानी पीना और रात में दही का सेवन – कफ और रक्त विकारों का कारण
मानसून के मौसम में सबसे ज्यादा बीमारियां दूषित जल के माध्यम से ही फैलती हैं। आयुर्वेद में जल को जीवन माना गया है, लेकिन वर्षा ऋतु में नदी, तालाब और भूमिगत जल की प्रकृति में भारी बदलाव आता है, जिससे जल दोषपूर्ण हो जाता है। बिना उबाला हुआ, सीधा नल का पानी या बर्फ वाला ठंडा पानी पीने से जठराग्नि तुरंत शांत हो जाती है और पाचन तंत्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। ठंडा पानी पीने से शरीर में कफ और वात दोष बढ़ता है। इसके अतिरिक्त, कई लोग रात के समय दही, छाछ या खट्टे पदार्थों का सेवन करते हैं, जो बारिश में बेहद नुकसानदायक है। दही की प्रकृति ‘अभिष्यंदी’ (शरीर की सूक्ष्म नालियों को बंद करने वाली) होती है। रात में दही खाने से शरीर में कफ दोष बढ़ता है, जिससे गले में इंफेक्शन, बुखार, कफ, निमोनिया और जोड़ों में सूजन आ सकती है। आयुर्वेद के अनुसार बारिश में हमेशा पानी को 10-15 मिनट अच्छी तरह उबालकर, गुनगुना करके ही पीना चाहिए। इसे ‘सिद्ध जल’ कहा जाता है जो शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।
वर्षा ऋतुचर्या: आयुर्वेद के अनुसार मानसून में क्या खाएं और किन बातों का रखें ध्यान?
वर्षा ऋतु में सेहतमंद रहने के लिए आयुर्वेद में एक संपूर्ण आहार और जीवनशैली का विधान बताया गया है जिसे ‘वर्षा ऋतुचर्या’ कहते हैं। यदि आप मानसून का आनंद बिना किसी बीमारी के लेना चाहते हैं, तो इन आयुर्वेदिक सुझावों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं:
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पुराने अनाज का सेवन: बारिश के दिनों में नए गेहूं या नए चावल के बजाय पुराना गेहूं, पुराना चावल (साली चावल), जौ और मक्का का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये पचने में हल्के होते हैं।
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मधु (शहद) का प्रयोग: आयुर्वेद में मानसून में शहद का सीमित सेवन अत्यंत शुभ माना गया है। पानी में या काढ़े में थोड़ा सा शुद्ध शहद मिलाकर पीने से वात और कफ दोष शांत होता है।
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सैंधव लवण और पाचक द्रव्य: भोजन पकाने में सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें। दालों और सब्जियों में सोंठ (सूखा अदरक), हींग, जीरा और काली मिर्च का छौंक जरूर लगाएं।
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तेल मालिश (अभ्यंग): वात दोष को शांत करने के लिए सप्ताह में दो से तीन बार तिल के तेल या सरसों के तेल से पूरे शरीर की मालिश (अभ्यंग) करें और उसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करें।
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आस-पास स्वच्छता और धूपन: घर में नमी और बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए गूगल, लोबान, नीम के सूखे पत्ते और सरसों से धूपन (धुएं की प्रक्रिया) करें। इससे घर का वातावरण शुद्ध और रोगाणुमुक्त रहता है।
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