Delhi Ambala Rail Quadrupling: दिल्ली-अंबाला रूट पर बिछेंगी दो नई पटरियां, ₹5983 करोड़ की मेगा परियोजना से खत्म होगी ट्रेनों की लेटलतीफी

देश की राजधानी दिल्ली को पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से जोड़ने वाले सबसे व्यस्त और रणनीतिक रूप से संवेदनशील दिल्ली-अंबाला रेलखंड का कायाकल्प होने जा रहा है। केंद्र सरकार और भारतीय रेलवे ने इस 194 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग पर तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने के मेगा प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया तेज कर दी है। कुल 5,983 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली इस बहुप्रतीक्षित मल्टी-ट्रैकिंग परियोजना के लिए निविदाएं (Tenders) जारी की जा चुकी हैं। वर्तमान में यह रेलखंड अपनी स्वीकृत क्षमता से लगभग 66 प्रतिशत अधिक ट्रेनों का भारी ट्रैफिक दबाव झेल रहा है। दो अतिरिक्त पटरियों के बिछ जाने से न केवल यात्री ट्रेनों की गति सीमा में उल्लेखनीय इजाफा होगा, बल्कि इस व्यस्त रूट पर ट्रेनों की लेटलतीफी और आउटर पर बेवजह खड़े रहने की पुरानी समस्या से भी हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।

दिल्ली से अंबाला के बीच का यह रूट उत्तर भारत की लाइफलाइन माना जाता है, जहां से रोजाना वंदे भारत, राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, पैसेंजर और मालगाड़ियों समेत 150 से अधिक ट्रेनें गुजरती हैं। अत्यधिक ट्रैफिक डेंसिटी की वजह से प्रीमियम ट्रेनों को रास्ता देने के लिए कई बार एक्सप्रेस और पैसेंजर गाड़ियों को छोटे स्टेशनों या आउटर सिग्नल्स पर घंटों खड़ा रखना पड़ता है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक के जरिए दिल्ली से कश्मीर घाटी तक सीधी रेल कनेक्टिविटी शुरू होने के बाद इस मार्ग पर ट्रेनों की संख्या में और बड़ा इजाफा दर्ज किया जा रहा है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, तीसरी और चौथी लाइन बिछने के बाद गुड्स ट्रेनों (मालगाड़ियों) और पैसेंजर ट्रेनों के लिए अलग-अलग डेडिकेटेड पाथ उपलब्ध होगा, जिससे ट्रेनों की औसत परिचालन गति में 20 से 30 किमी प्रति घंटे की बढ़ोतरी होगी।

यह महत्वाकांक्षी रेल कॉरिडोर दिल्ली (सब्जी मंडी, नरेला) से शुरू होकर हरियाणा के पांच प्रमुख औद्योगिक व कृषि जिलों—सोनीपत, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र और अंबाला कैंट से होकर गुजरेगा। परियोजना के तहत 32 रेलवे स्टेशनों पर आधुनिक यात्री सुविधाएं, नए प्लेटफॉर्म और लूप लाइनों का विस्तार किया जाएगा। बुनियादी ढांचे को सुरक्षित और गति-अनुकूल बनाने के लिए रूट पर रेल ओवर ब्रिज (ROB) और रेल अंडर ब्रिज (RUB) बनाए जाएंगे ताकि सभी मानवरहित और व्यस्त समपार फाटकों को पूरी तरह समाप्त किया जा सके। पहले चरण में सब्जी मंडी से अंबाला कैंट के बीच ट्रैक, सिविल वर्क, आधुनिक ऑटोमैटिक सिग्नलिंग, अत्याधुनिक टेलीकम्युनिकेशन और ओवरहेड इक्विपमेंट (OHE) विद्युतीकरण कार्यों के लिए 3,612 करोड़ रुपये की निविदाएं आमंत्रित की जा चुकी हैं।

दिल्ली-अंबाला रेलमार्ग केवल आम यात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भारतीय सेना के लिए भी रीढ़ की हड्डी के समान है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमावर्ती चौकियों तक सैनिकों, भारी तोपों, सैन्य साजो-सामान और रसद की त्वरित आवाजाही इसी मुख्य गलियारे से होती है। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि इसके निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर नई निजी भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। रेलवे के पास मौजूदा ट्रैक के दोनों ओर पहले से ही पर्याप्त राइट ऑफ वे (RoW) उपलब्ध है, जिससे परियोजना बिना किसी कानूनी या भूमि विवाद के निर्धारित 4 वर्षों की समयावधि में तेजी से पूरी की जा सकेगी।

उत्तर भारत के पर्यटन उद्योग के लिए यह परियोजना एक गेम-चेंजर साबित होने वाली है। दिल्ली-एनसीआर से माता वैष्णो देवी (कटरा), कश्मीर घाटी, अमृतसर स्वर्ण मंदिर, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश (कालका-शिमला) जाने वाले लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों का सफर बेहद तेज और समयबद्ध हो जाएगा। ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी बढ़ने से त्योहारी सीजन और छुट्टियों के दौरान कंफर्म टिकट मिलने की संभावनाएं काफी बढ़ जाएंगी। इसके साथ ही, हरियाणा के ऐतिहासिक और धार्मिक शहर कुरुक्षेत्र (गीता स्थली) में भी देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की आवाजाही को इस सुगम रेल नेटवर्क से नई गति मिलेगी।

यात्री परिवहन के अलावा यह परियोजना देश के ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र को अभूतपूर्व मजबूती देगी। पानीपत, रोपड़, गुरु गोबिंद सिंह और राजपुरा स्थित प्रमुख थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की निरंतर और तेज आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी। हरियाणा के अनाज मंडियों, वेयरहाउसिंग हब्स, सोनीपत-पानीपत के टेक्सटाइल क्लस्टर्स और ऑटोमोबाइल उद्योगों से माल ढुलाई क्षमता में सालाना करीब 24.6 मिलियन टन (MTPA) की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी। माल ढुलाई में लगने वाले समय और लॉजिस्टिक्स लागत में सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत होगी। पर्यावरण के नजरिए से देखें तो सड़कों से भारी ट्रकों का दबाव रेलवे पर शिफ्ट होने से हर साल लगभग 43 करोड़ किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन रुकेगा।

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