Daayra Movie Fact Check: क्या 2019 के रूह कंपा देने वाले हैदराबाद गैंगरेप और एनकाउंटर पर आधारित है करीना-पृथ्वीराज की फिल्म ‘दायरा’?

बॉलीवुड निर्देशक मेघना गुलजार भारतीय सिनेमा में यथार्थवादी, संवेदनशील और समाज को झकझोर देने वाली वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जानी जाती हैं। चाहे 2008 के आरुषि तलवार हत्याकांड पर बनी ‘तलवार’ हो या फिर 1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ‘राजी’, मेघना हमेशा कानून, व्यवस्था और मानवीय अंतर्द्वंद्व के अनसुलझे पहलुओं को परदे पर उतारती हैं। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन अभिनीत उनकी आगामी फिल्म ‘दायरा’ (Daayra) के ट्रेलर और प्लॉट डिटेल्स के सामने आते ही यह चर्चा तेज हो गई है कि यह फिल्म 27 नवंबर 2019 को देश को हिलाकर रख देने वाले हैदराबाद वेटरनरी डॉक्टर गैंगरेप-मर्डर केस और उसके बाद 6 दिसंबर 2019 को हुए बहुचर्चित पुलिस एनकाउंटर पर आधारित है। फिल्म में जिस तरह से एक जघन्य महिला अपराध के बाद पुलिसिया कार्रवाई, जन आक्रोश और कानूनी सीमाओं (कानून के दायरे) के बीच का घमासान दिखाया गया है, उसने 2019 के उस घटनाक्रम की यादें ताजा कर दी हैं जिसने पूरे देश को दो विचारधाराओं में बांट दिया था।

27 नवंबर 2019 की वह खौफनाक रात: जब शर्मसार हुई थी इंसानियत

हैदराबाद के बाहरी इलाके शमशाबाद स्थित टोंडुपल्ली टोल प्लाजा पर 27 नवंबर 2019 की शाम 26 वर्षीय महिला पशु चिकित्सक अपनी स्कूटी पार्क करके डॉक्टर के पास गई थीं। जब वे रात लगभग 9:15 बजे वापस लौटीं, तो उनकी स्कूटी का पिछला पहिया पंक्चर था। जांच में बाद में खुलासा हुआ कि यह पहिया जानबूझकर चार ट्रक चालकों और क्लीनरों—मोहम्मद आरिफ, जोल्लू शिवा, जोल्लू नवीन और चिंताकुंटा चेन्नाकेशवुलु—द्वारा हवा निकालकर पंक्चर किया गया था ताकि वे मदद के बहाने युवती को अपने जाल में फंसा सकें।

मदद का झांसा देकर चारों आरोपियों ने युवती को सुनसान झाड़ियों में खींच लिया, जहां उनके साथ बारी-बारी से दरिंदगी की गई और उनका दम घोंटकर हत्या कर दी गई। इसके बाद आरोपी शव को एक लॉरी में रखकर लगभग 25 किलोमीटर दूर चटनपल्ली अंडरपास (शादनगर) के पास ले गए, जहां उन्होंने शव पर पेट्रोल डालकर उसे पुलिया के नीचे जला दिया। अगली सुबह जब युवती का अधजला शव बरामद हुआ, तो पूरे देश में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी। संसद से लेकर सड़कों तक केवल एक ही मांग गूंज रही थी—दोषियों को तुरंत और कठोरतम सजा दी जाए।

6 दिसंबर 2019 की तड़के 3 से 6 बजे: चटनपल्ली में कैसे हुआ था चारों आरोपियों का एनकाउंटर?

घटना के 48 घंटे के भीतर साइबराबाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और चश्मदीदों के आधार पर चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जनता का गुस्सा इतना प्रचंड था कि शादनगर पुलिस थाने के बाहर हजारों लोगों ने थाने का घेराव कर लिया था और आरोपियों को जनता के हवाले करने की मांग कर रहे थे।

गिरफ्तारी के ठीक 7 दिन बाद, 6 दिसंबर 2019 की सुबह खबर आई कि पुलिस मुठभेड़ में चारों आरोपी मारे गए हैं। पुलिस की आधिकारिक थ्योरी के अनुसार, 6 दिसंबर की सुबह लगभग 3 से 5:30 बजे के बीच पुलिस की एक 10 सदस्यीय टीम चारों आरोपियों को क्राइम सीन रिकंस्ट्रक्ट (घटना का नाट्य रूपांतरण) करने और पीड़िता का छिपाया गया मोबाइल फोन व अन्य सबूत बरामद करने के लिए उसी चटनपल्ली अंडरपास के पास ले गई थी।

पुलिस का दावा था कि वहां पहुंचते ही आरोपियों ने पुलिसकर्मियों पर पत्थरों और लाठियों से हमला कर दिया। मुख्य आरोपी मोहम्मद आरिफ और चेन्नाकेशवुलु ने पुलिसकर्मियों की अनलॉक्ड सरकारी पिस्टल छीन ली और पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारियों के अनुसार, आत्मरक्षा (Self-Defense) में पुलिस ने जवाबी गोलीबारी की, जिसमें चारों आरोपी मौके पर ही ढेर हो गए। इस दौरान दो पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी कही गई।

जब देश ने बरसाए फूल, लेकिन मानवाधिकार और कानून के सामने खड़े हुए तीखे सवाल

एनकाउंटर की खबर फैलते ही घटनास्थल और हैदराबाद पुलिस कमिश्नर के कार्यालय के बाहर हजारों लोग जमा हो गए। लोगों ने पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए, राखी बांधी और ‘पुलिस जिंदाबाद’ के नारे लगाए। पीड़िता के परिजनों ने त्वरित न्याय मिलने पर राहत की सांस ली और देश के एक बड़े वर्ग ने इसे ‘सच्चा और त्वरित इंसाफ’ (Instant Justice) माना।

किंतु दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों, पूर्व न्यायाधीशों और मानवाधिकार संगठनों ने इस एनकाउंटर पर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि यदि पुलिस ही सड़क पर फैसला करने लगेगी और न्यायपालिका की भूमिका खुद निभाएगी, तो देश का संविधान और कानून का राज (Rule of Law) खतरे में पड़ जाएगा। बिना मुकदमे के गोली मार देना न्याय नहीं बल्कि गैर-न्यायिक हत्या (Extrajudicial Killing) है।

सुप्रीम कोर्ट का सिरपुरकर आयोग: जांच रिपोर्ट में एनकाउंटर पर क्या हुआ था बड़ा खुलासा?

एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2019 में शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश वी.एस. सिरपुरकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय स्वतंत्र जांच आयोग का गठन किया। मई 2022 में सिरपुरकर आयोग की 387 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई, जिसने पुलिस की पूरी कहानी को कटघरे में खड़ा कर दिया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट निष्कर्ष दिया कि:

  • यह कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि आरोपियों को जानबूझकर गोली मारकर मारा गया था।

  • पुलिस का यह दावा पूरी तरह अविश्वसनीय था कि आरोपियों ने पिस्टल छीनकर फायरिंग की, क्योंकि वे हथियार चलाना नहीं जानते थे और उनके हाथों पर बारूद के कोई वैज्ञानिक अंश (Gunshot Residue) नहीं मिले।

  • आरोपियों में से तीन (जोल्लू शिवा, जोल्लू नवीन और चेन्नाकेशवुलु) घटना के समय नाबालिग (Minor) थे।

  • आयोग ने एनकाउंटर में शामिल 10 पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चलाने की सिफारिश की।

फिल्म ‘दायरा’ में कैसे टकरा रहे हैं पृथ्वीराज सुकुमारन और करीना कपूर के किरदार?

फिल्म ‘दायरा’ की कहानी इसी एनकाउंटर और उसके बाद उठे कानूनी-नैतिक तूफान से सीधे प्रेरित नजर आती है। फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन एक बेहद सख्त, जनभावनाओं को समझने वाले और अपराधियों के प्रति निर्मम एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं, जिनका मानना है कि जब दरिंदे कानून की खामियों का फायदा उठाकर वर्षों तक जेल में बचते रहते हैं, तो समाज को बचाने के लिए कड़े और तात्कालिक कदम उठाना पुलिस का धर्म बन जाता है।

वहीं दूसरी ओर, करीना कपूर खान एक बेहद तेज-तर्रार, सिद्धांतवादी मानवाधिकार वकील और जांच अभियोजक (Investigative Prosecutor) के रूप में नजर आ रही हैं। करीना का किरदार यह साबित करने के लिए अदालत में लड़ता है कि एनकाउंटर न्याय नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता को छिपाने का एक शॉर्टकट है। फिल्म में दोनों मंझे हुए कलाकारों के बीच की तीखी बहस यह सवाल उठाती है कि क्या बदले की भावना को न्याय कहा जा सकता है और क्या किसी भी सूरत में ‘कानून के दायरे’ को तोड़ा जाना जायज है?

‘त्वरित न्याय’ बनाम ‘संविधान का दायरा’: समाज के सामने आज भी अनुत्तरित है यह यक्ष प्रश्न

2019 का हैदराबाद एनकाउंटर हो या फिल्म ‘दायरा’ का कथानक, यह दोनों ही उस कड़वी सामाजिक सच्चाई को उजागर करते हैं जहां हमारी न्यायिक प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार से हताश होकर आम जनता ‘ऑन द स्पॉट फैसले’ का जश्न मनाने लगती है। जब अदालतों में जघन्य मामलों के फैसले आने में दशकों लग जाते हैं, तो भीड़ कानून अपने हाथ में लेने वालों को मसीहा मानने लगती है।

किंतु इसका दूसरा स्याह पहलू यह है कि यदि बिना ट्रायल के गोली मारने की छूट दे दी जाए, तो कभी भी किसी निर्दोष को फंसाकर उसका जीवन खत्म किया जा सकता है। फिल्म ‘दायरा’ इसी जटिल, संवेदनशील और रोंगटे खड़े कर देने वाले विषय की गहराई में उतरती है। यह फिल्म किसी एक पक्ष का महिमामंडन करने के बजाय दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि इंसाफ की मंजिल तक पहुंचने के लिए चुना गया रास्ता कितना सही है।

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