15वीं सदी से चली आ रही अनोखी परंपरा देखने उमड़ा जनसैलाब, जानें क्यों ड्रॉ हुआ मैच

जापान के ओकिनावा प्रांत की राजधानी नाहा की सड़कों पर एक ऐसा विस्मयकारी और विशाल सांस्कृतिक नजारा देखने को मिला, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सदियों पुरानी जीवंत संस्कृति को संजोए रखने वाले इस देश में पारंपरिक 'ग्रेट टग-ऑफ-वॉर' (Naha Great Tug-of-War Festival) प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक मुकाबले में भाग लेने और अपनी पूरी ताकत आजमाने के लिए हजारों स्थानीय नागरिक और विदेशी पर्यटक सड़कों पर उतर आए। इस अनोखे मुकाबले का मुख्य आकर्षण कोई साधारण रस्सी नहीं, बल्कि लगभग 160 मीटर लंबी और 30 टन से भी अधिक भारी-भरकम रस्सी थी, जिसे खींचने के लिए जनसमूह दो बड़े गुटों में बंट गया।

15वीं सदी के रयुक्यु साम्राज्य से जुड़ी है इस महामुकाबले की ऐतिहासिक जड़ें

नाहा में आयोजित होने वाला यह विशालकाय रस्साकशी का खेल केवल शक्ति प्रदर्शन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसका इतिहास 15वीं सदी के प्राचीन रयुक्यु साम्राज्य से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल से ही स्थानीय समुदाय इस अनूठे उत्सव के जरिए आने वाले मौसम में अच्छी फसल, समाज के सभी लोगों के लिए उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि और परिवारों में संतान सुख की मंगल कामना करते रहे हैं। परंपरा के अनुसार, इस महामुकाबले में भाग लेने वाले जनसमूह को 'पूर्व' और 'पश्चिम' नामक दो ऐतिहासिक टीमों में विभाजित किया जाता है। दोनों पक्षों के बीच शक्ति, संतुलन और एकजुटता का ऐसा अभूतपूर्व संघर्ष देखने को मिलता है जो दुनिया में शायद ही कहीं और नजर आए।

जीत के कड़े नियम, 10 मिनट के कड़े संघर्ष के बाद मुकाबला रहा बराबरी पर

इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता के नियम भी बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण हैं। रस्साकशी के नियमों के मुताबिक, किसी भी टीम को विजेता घोषित होने के लिए उस 30 टन वजनी रस्सी को कम से कम 5 मीटर की दूरी तक अपनी दिशा में खींचना अनिवार्य होता है। यदि कोई भी टीम निर्धारित 5 मीटर की दूरी तक नहीं खींच पाती, तो 30 मिनट की समयावधि समाप्त होने पर जिस टीम ने रस्सी को विपक्षी खेमे के मुकाबले अधिक दूरी तक खींचा होता है, उसे विजयी घोषित किया जाता है। इस वर्ष भी दोनों टीमों के बीच भारी उत्साह और जोश के साथ मुकाबला शुरू हुआ। लगभग 10 मिनट तक चले इस कड़े और रोमांचक संघर्ष में दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर भारी पड़ने की कोशिश करते रहे, लेकिन अंततः यह मुकाबला बराबरी पर छूटा और इसे ड्रॉ घोषित किया गया। प्रतियोगिता की एक और खास परंपरा यह भी है कि रस्साकशी समाप्त होने के बाद प्रतिभागी और दर्शक इस पवित्र रस्सी के छोटे-छोटे हिस्से काटकर अपने घरों को ले जाते हैं, जिसे सालभर सौभाग्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि लाने वाला माना जाता है।

सेंडाई ओत्सुनाहिकी और जापान की अमूर्त लोक सांस्कृतिक धरोहर

जापान में इस प्रकार के रस्साकशी आयोजनों की एक समृद्ध सैन्य और लोक गाथा भी रही है। 'सेंडाई ओत्सुनाहिकी' जैसे बड़े आयोजनों की शुरुआत के पीछे सत्सुमा (जो वर्तमान समय में कागोशिमा प्रांत का हिस्सा है) के प्रख्यात योद्धा शिमाज़ु योशिहिरो का नाम जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1600 में प्रसिद्ध सेकिगाहारा की भीषण लड़ाई से ठीक पहले अपने सैनिकों का मनोबल और आपसी तालमेल बढ़ाने के उद्देश्य से विशाल रस्सियों को खींचने की इस सैन्य परंपरा को शुरू किया था। आधुनिक दौर में जापानी संस्कृति की यह अटूट पहचान बन चुकी है। यही वजह है कि जापान की सरकार ने इस ऐतिहासिक आयोजन को देश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संरक्षित 'अमूर्त लोक सांस्कृतिक धरोहर' का आधिकारिक दर्जा दिया है।

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