इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शामली के जिलाधिकारी द्वारा दो व्यक्तियों पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA/रासुका) के आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कृत्य किसी मकान की चारदीवारी (बंद कमरे) के भीतर किया गया है और उससे सार्वजनिक शांति या सांप्रदायिक सौहार्द पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है, तो उस पर NSA जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणी:
न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा:
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“कथित कृत्य किसी तरह की हिंसा या लोक शांति में व्यवधान का मामला नहीं था।”
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NSA के तहत हिरासत में लेने के लिए जो परिस्थितियां आवश्यक हैं, वे इस मामले में मौजूद नहीं थीं।
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अदालत ने याचिकाकर्ताओं, इस्लाम उर्फ इसाम और समीर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
क्या था पूरा मामला?
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पिछले साल 23 अप्रैल को शामली पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक घर के भीतर गोकशी हो रही है।
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पुलिस ने मौके से मांस, खाल और अन्य अवशेष बरामद किए थे। पशु चिकित्सक की जांच में इसकी पुष्टि हुई थी।
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इसके आधार पर जिलाधिकारी ने 7 जुलाई, 2025 को गो हत्या निषेध कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज करते हुए दोनों आरोपियों को 12 महीने के लिए NSA के तहत हिरासत में रखने का आदेश दिया था।
पत्रकार सत्यम वर्मा की याचिका पर भी सुनवाई:
इसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के श्रमिक आंदोलन से संबंधित मामले में गिरफ्तार पत्रकार सत्यम वर्मा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी संज्ञान लिया। कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। याचिका में गिरफ्तारी प्रक्रिया में ‘प्रक्रियात्मक अनियमितताओं’ का आरोप लगाया गया है और अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तारीख निर्धारित की गई है।
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