
अगस्त का महीना इस बार मौसम और कृषि के लिहाज से ऐतिहासिक साबित हुआ है। मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष अगस्त में दर्ज की गई कुल वर्षा ने पिछले 35 वर्षों का रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया है। महीने की शुरुआत से लेकर आखिरी दिनों तक मानसूनी बादलों का ऐसा व्यापक और अनवरत जमावड़ा देखा गया, जिसने समूचे उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के वर्षा मानचित्र को पूरी तरह बदल कर रख दिया। सामान्य से कहीं अधिक हुई इस मूसलाधार बरसात ने न केवल मौसम के मिजाज को सुहावना बना दिया, बल्कि सूखे के कगार पर खड़े कृषि क्षेत्रों में नई ऊर्जा का संचार कर दिया है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि 1980 के दशक के अंतिम वर्षों के बाद अगस्त में पहली बार मानसूनी हवाओं की ऐसी लगातार सक्रियता और बारिश की तीव्रता दर्ज की गई है।
जुलाई के सूखे का डर हुआ पूरी तरह खत्म: खरीफ फसलों को मिला संजीवनी वरदान
जुलाई के महीने में बारिश की भारी खिन्नता और सामान्य से काफी कम वर्षा के चलते देश भर के किसान गहरे संकट में आ गए थे। कई राज्यों में धान की रोपाई पिछड़ गई थी और मक्का, दलहन, तिलहन तथा कपास की बोई गई फसलें खेतों में पानी की कमी के कारण सूखने लगी थीं। किसान लगातार आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे थे और नलकूपों के सहारे महंगे डीजल से सिंचाई करने को मजबूर थे, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी। लेकिन अगस्त की शुरुआत के साथ ही बदले मौसम तंत्र ने इस सूखे परिदृश्य को पूरी तरह पलट दिया। लगातार हुई झमाझम बारिश ने न केवल जुलाई के मानसूनी घाटे को पूरी तरह पाट दिया, बल्कि जमीन में नमी का पर्याप्त स्तर भी बहाल कर दिया। इससे धान की खड़ी फसल को संजीवनी मिल गई है और किसानों के चेहरों पर चमक लौट आई है।
जलस्रोतों और बांधों में लौटी नई जान: भूजल स्तर में दर्ज हुआ अप्रत्याशित सुधार
अगस्त की इस रिकॉर्डतोड़ बरसात का सबसे बड़ा लाभ देश के प्रमुख बांधों, जलविद्युत परियोजनाओं, झीलों और पारंपरिक जलस्रोतों को मिला है। जुलाई के अंत तक जो जलाशय अपनी कुल भंडारण क्षमता के 30 से 40 प्रतिशत तक सिमट गए थे, वे अब 80 से 95 प्रतिशत तक लबालब भर चुके हैं। कई प्रमुख नदियों का जलस्तर तेजी से ऊपर उठा है और सहायक नदियां तथा बरसाती नाले पूरी क्षमता से बह रहे हैं। लगातार हुई बारिश के चलते जलभृतों (Aquifers) का तेजी से पुनर्भरण हुआ है, जिससे गिरते भूजल स्तर में कई फीट तक का उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। यह स्थिति आने वाले महीनों में पेयजल संकट को दूर करने के साथ-साथ शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में बेहद मददगार साबित होगी।
मौसम विभाग का गहन विश्लेषण: मानसूनी ट्रफ और कम दबाव के चक्र का दोहरा असर
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, अगस्त में 35 साल पुराना रिकॉर्ड टूटने के पीछे एक साथ कई अनुकूल मौसम प्रणालियों की सक्रियता रही है। बंगाल की खाड़ी में एक के बाद एक लगातार तीन से चार गहरे निम्न दबाव के क्षेत्र (Low Pressure Areas) और डिप्रेशन विकसित हुए, जिन्होंने नमी से भरी मानसूनी हवाओं को लगातार मैदानी इलाकों की ओर धकेला। इसके साथ ही, मानसून की ट्रफ रेखा अपनी सामान्य स्थिति से दक्षिण और मध्य भारत के ऊपर लंबे समय तक टिकी रही। अरब सागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिमी हवाओं ने भी इस मानसूनी तंत्र को भरपूर नमी प्रदान की। दोनों समुद्री शाखाओं के इस दुर्लभ और संतुलित तालमेल के कारण देश के अधिकांश हिस्सों में व्यापक और समान बारिश का वितरण देखने को मिला, जिससे बारिश के दिनों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ।
कृषि वैज्ञानिकों की किसानों को अहम सलाह: जलजमाव से बचाव और पोषण प्रबंधन जरूरी
फसलों के लिए अमृत बनकर बरसी इस बारिश के बीच कृषि विज्ञान केंद्रों और विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने के सुझाव भी दिए हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां धान की फसल के लिए यह पानी वरदान है, वहीं दलहन, उड़द, मूंग, सोयाबीन और सब्जियों की फसलों में लंबे समय तक जलभराव नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसलिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपने खेतों से अतिरिक्त पानी की निकासी का तुरंत प्रबंध करें ताकि जड़ों के सड़ने और फफूंदजनित रोगों के प्रसार को रोका जा सके। इसके अलावा, बारिश रुकने के बाद खेतों में कीटों और बीमारियों की निगरानी करने तथा अनुशंसित मात्रा में यूरिया, पोटाश और जिंक जैसे पोषक तत्वों का संतुलित छिड़काव करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि पैदावार में किसी प्रकार की गिरावट न आए।
आगामी रबी सीजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी साबित होगी बड़ी संजीवनी
अगस्त की इस बंपर मानसूनी बारिश का सकारात्मक प्रभाव केवल मौजूदा खरीफ फसलों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले रबी विपणन सत्र पर भी इसका गहरा और अनुकूल असर पड़ेगा। मिट्टी में पर्याप्त नमी जमा हो जाने से अक्टूबर और नवंबर के महीनों में गेहूं, चना, सरसों, मटर और जौ की अगेती बुवाई बेहद आसान और सफल होगी। किसानों को पलेवा (बुवाई पूर्व सिंचाई) के लिए अतिरिक्त भूजल या बिजली पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे उनकी इनपुट लागत में भारी कटौती होगी। जलाशयों में पर्याप्त पानी होने के कारण रबी फसलों के पूरे चक्र के दौरान नहरों से नियमित पानी मिलना तय हो गया है। इस मानसूनी उछाल से देश में अन्न उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित होने की प्रबल संभावना बन गई है, जो सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बाजार को मजबूत आधार प्रदान करेगी।
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