ढाका | दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश की नवनियुक्त तारिक रहमान सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना (TRCMRP) के लिए आधिकारिक तौर पर चीन से वित्तीय और तकनीकी मदद मांगी है। यह विकास भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि यह परियोजना भारत के सबसे संवेदनशील हिस्से ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के बेहद करीब स्थित है।
क्या है तीस्ता नदी परियोजना (TRCMRP)?
लगभग 1 अरब डॉलर की लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य उत्तरी बांग्लादेश के रंगपुर क्षेत्र में जल संकट और बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान खोजना है। इसमें शामिल मुख्य कार्य हैं:
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नदी का गहरीकरण: नदी की गहराई बढ़ाकर 10 मीटर करना ताकि पानी का भंडारण (Storage) किया जा सके।
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चौड़ाई कम करना: नदी के फैलाव को सीमित कर उसे 1 किलोमीटर के दायरे में लाना।
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भूमि सुधार (Land Reclamation): तटबंधों के निर्माण के जरिए लगभग 170 वर्ग किलोमीटर भूमि को कृषि और औद्योगिक पार्कों के लिए विकसित करना।
‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को खतरा क्यों?
पश्चिम बंगाल में स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा रास्ता है। इसकी चौड़ाई मात्र 20-22 किलोमीटर है।
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चीन की निकटता: यह चीनी सहायता प्राप्त परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर से मात्र 100-130 किलोमीटर की दूरी पर होगी।
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खुफिया निगरानी: विशेषज्ञों का मानना है कि निर्माण कार्य के बहाने चीन इस इलाके में अपनी तकनीकी उपस्थिति दर्ज कराएगा, जिससे वह भारत की सैन्य गतिविधियों और लॉजिस्टिक्स पर आसानी से नजर रख सकेगा।
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लालमोनिरहाट एयरबेस: ऐसी भी खबरें हैं कि चीन की मदद से बांग्लादेश के लालमोनिरहाट में एक पुराना एयरबेस विकसित किया जा रहा है। अगर यहां चीनी ड्रोन या सर्विलांस विमान तैनात होते हैं, तो यह भारत के लिए सीधा सैन्य खतरा होगा।
ढाका का बीजिंग की ओर झुकाव
फरवरी 2026 में सत्ता संभालने के बाद पीएम तारिक रहमान की सरकार का झुकाव चीन की ओर साफ दिख रहा है। मई 2026 में विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान की बीजिंग यात्रा के दौरान चीन ने इस परियोजना को अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत पूरा समर्थन देने का वादा किया है। हालांकि चीन का कहना है कि उसका यह कदम किसी ‘तीसरे देश’ (भारत) के खिलाफ नहीं है, लेकिन भारत इसे क्षेत्र में चीन की बढ़ती घेराबंदी के रूप में देख रहा है।
भारत-बांग्लादेश जल विवाद की पृष्ठभूमि
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तीस्ता समझौता: 2011 से ही तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर समझौता अटका हुआ है, जिसका मुख्य कारण पश्चिम बंगाल सरकार की असहमति है।
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गंगा जल संधि: 1996 में हुई ऐतिहासिक गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। इस संधि के नवीनीकरण से पहले बांग्लादेश का चीन को तीस्ता परियोजना में लाना भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है।
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फरक्का बैराज: बांग्लादेश लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि भारत के फरक्का बैराज के कारण सूखे के मौसम में उसे पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।
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