
निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान दवाओं, सर्जिकल उपकरणों और कंज्यूमेबल्स पर मनमाने बिलिंग और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से ज्यादा वसूली के शिकार हो रहे मरीजों और तीमारदारों के लिए बहुत बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में निजी अस्पतालों की मनमानी और अत्यधिक मुनाफाखोरी के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने एक ठोस और कड़ा रुख अख्तियार किया है। सरकार ने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया है कि अस्पतालों में दवाओं, मेडिकल डिवाइसेज और जांच शुल्कों के नाम पर मरीजों से होने वाली अवैध वसूली पर पूरी तरह अंकुश लगाने के लिए जल्द ही एक राष्ट्रव्यापी विनियामक ढांचा और सख्त दिशा-निर्देश (Guidelines) लागू किए जाएंगे। केंद्र की इस स्पष्ट प्रतिबद्धता के बाद उन कॉरपोरेट और निजी अस्पतालों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है, जो इन-हाउस फार्मेसी के जरिए मरीजों को खुले बाजार से दवाएं खरीदने से रोकते हैं और बिल में बेतहाशा अतिरिक्त चार्ज जोड़ देते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आई याचिकाओं में यह गंभीर तथ्य उठाया गया था कि देश भर के कई निजी अस्पताल अपने परिसरों में केवल अपनी अधिकृत फार्मेसी से ही दवाएं और सर्जिकल सामान खरीदने की शर्त थोपते हैं। इसके अलावा पैकेजिंग पर छपे एमआरपी से भी कई गुना ज्यादा कीमत ‘हॉस्पिटल चार्ज’ या ‘एडमिनिस्ट्रेशन फीस’ के रूप में बिल में जोड़ दी जाती है। शीर्ष अदालत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों को सम्मानजनक जीवन और स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार देता है। गंभीर बीमारी की स्थिति में लाचार मरीज या उसके परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाकर अत्यधिक मुनाफा कमाना किसी भी सूरत में अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने सरकार से सवाल किया था कि आखिर क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट रूल्स के तहत राज्यों और अस्पतालों के लिए मानकीकृत दरों (Standardized Rates) का निर्धारण अभी तक पूरी तरह क्यों लागू नहीं हो सका है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता के लिए पारदर्शी और वहन करने योग्य बनाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। सरकार ने न्यायालय के समक्ष 4 प्रमुख कदमों का प्रारूप प्रस्तुत किया है:
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दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज पर सख्त मूल्य नियंत्रण: नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के समन्वय से जरूरी दवाओं के साथ-साथ स्टेंट, ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट्स, सिरिंज, ग्लव्स और अन्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स के ट्रेड मार्जिन को सीमित करने की प्रक्रिया तेज की जाएगी।
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इन-हाउस फार्मेसी की मोनोपोली होगी खत्म: अस्पतालों को स्पष्ट आदेश दिए जाएंगे कि वे मरीजों के परिजनों को अस्पताल परिसर से बाहर की किसी भी रजिस्टर्ड या जन औषधि केंद्र से दवाएं लाने से नहीं रोक सकते। ऐसा करने वाले अस्पतालों की मान्यता खतरे में पड़ सकती है।
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रेट लिस्ट का अनिवार्य सार्वजनिक प्रदर्शन: हर निजी अस्पताल को अपने रिसेप्शन, वेबसाइट और बिलिंग काउंटर पर सभी सामान्य प्रक्रियाओं, बेड चार्ज, आईसीयू शुल्क और बुनियादी जांचों की आधिकारिक रेट लिस्ट चस्पा करनी होगी, ताकि मरीज को भर्ती से पहले अनुमानित खर्च का पारदर्शी ब्योरा मिल सके।
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अवैध वसूली पर भारी जुर्माना और लाइसेंस कैंसिलेशन: एमआरपी से अधिक एक भी रुपया वसूलने पर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अस्पताल के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी और बार-बार नियम तोड़ने पर अस्पताल का संचालन लाइसेंस निलंबित किया जा सकेगा।
केंद्र सरकार ने 2010 में ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट’ बनाया था, जिसमें अस्पतालों द्वारा ली जाने वाली फीस की एक न्यूनतम और अधिकतम सीमा निर्धारित करने का प्रावधान था। लेकिन स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय होने के कारण कई बड़े राज्यों ने इसे पूरी तरह लागू करने में हीलाहवाली दिखाई। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों के साथ उच्च स्तरीय बैठक कर राज्यों को अपने-अपने स्तर पर निजी अस्पतालों की दरों को तर्कसंगत (Rationalize) करने के निर्देश दिए हैं। यदि राज्य सरकारें मानक दरें तय करने में विफल रहती हैं, तो केंद्र सरकार केंद्रीय स्वास्थ्य कानून के तहत एक कॉमन मॉडल रेट चार्ट जारी करने पर विचार कर रही है, जो पूरे देश में आधारभूत मानक बनेगा।
विधिक और उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी उत्पाद पर दर्ज एमआरपी (Maximum Retail Price) वह अधिकतम सीमा होती है, जिससे अधिक कीमत लेना कानूनी अपराध है। अस्पताल चाहे कितना भी बड़ा या कॉरपोरेट क्यों न हो, वह एमआरपी से अधिक पैसे नहीं ले सकता। यदि कोई अस्पताल दवाओं, सिरिंज या अन्य सामान पर एमआरपी से अधिक बिल बनाता है या बाहर से दवा खरीदने पर मरीज को डिस्चार्ज करने की धमकी देता है, तो उपभोक्ता निम्नलिखित माध्यमों से तुरंत कार्रवाई करा सकते हैं:
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राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (NCH): टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके या कंज्यूमर ऐप के जरिए तुरंत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
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लीगल मेट्रोलॉजी विभाग (नाप-तौल विभाग): राज्य के लीगल मेट्रोलॉजी कंट्रोलर को एमआरपी उल्लंघन की शिकायत साक्ष्य (अस्पताल बिल और पैकेट की तस्वीर) के साथ ईमेल या लिखित में दी जा सकती है।
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उपभोक्ता फोरम (Consumer Court): अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) के तहत जिला उपभोक्ता आयोग में हर्जाने और रिफंड के लिए केस दायर किया जा सकता है।
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए इस भरोसे से देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों को बड़ी संबल मिली है, जो किसी भी गंभीर बीमारी के इलाज के दौरान अस्पतालों के भारी-भरकम और गैर-पारदर्शी बिलों के बोझ तले कर्ज में डूब जाते हैं। अब सभी की निगाहें सरकार द्वारा जारी होने वाले अंतिम दिशा-निर्देशों पर टिकी हैं।
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