
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से जुड़े चयन पैनल के विवाद ने एक बार फिर बड़ा कानूनी और संवैधानिक मोड़ ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पारित ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 5 सदस्यीय संविधान पीठ (Constitution Bench) के पास भेजने का निर्णय लिया है।
शीर्ष अदालत की दो जजों की खंडपीठ ने याचिकाओं पर विचार करते हुए पाया कि इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मुद्दे पर जजों की कानूनी राय बंटी हुई है और इसमें संविधान के मूलभूत ढांचे (Basic Structure) तथा निष्पक्ष चुनाव से जुड़े गहरे संवैधानिक सवाल निहित हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक एक बड़ी संवैधानिक पीठ इस कानून की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुना देती, तब तक इस चयन प्रक्रिया की संवैधानिकता का प्रश्न खुला रहेगा।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ के जजों के बीच विधायी शक्ति और न्यायपालिका के पिछले फैसलों की व्याख्या को लेकर मतभेद उभरे:
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एक दृष्टिकोण (संसद की विधायी सर्वोच्चता): इस विचार के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 324(2) में स्पष्ट लिखा गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून के अधीन होगी। जब संसद ने विधिवत कानून पारित कर दिया है, तो चयन पैनल की संरचना तय करना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है और इसमें न्यायपालिका को दखल देने से बचना चाहिए।
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दूसरा दृष्टिकोण (संस्थान की स्वायत्तता और अनूप बरनवाल फैसला): दूसरे विचार का मानना है कि मार्च 2023 में 5 जजों की संविधान पीठ (अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ) ने निष्पक्ष चुनाव को लोकतंत्र का आधार स्तंभ मानते हुए ही सीजेआई को पैनल में शामिल किया था। सरकार द्वारा सीजेआई को हटाकर अपने ही एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से 2:1 के बहुमत से कार्यपालिका का ही पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
राय में एकरूपता न होने और अनूप बरनवाल मामले के 5 जजों के पूर्व फैसले की नजीर के चलते मामले को औपचारिक रूप से चीफ जस्टिस को रेफर किया गया ताकि वे 5 जजों की नई संविधान पीठ का गठन कर सकें।
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की तत्कालीन 5 जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि जब तक संसद कोई नया कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक त्रिसदस्यीय समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें शामिल थे:
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भारत के प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
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लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)
हालांकि, दिसंबर 2023 में संसद के दोनों सदनों ने नया कानून पारित किया। इस नए कानून में चयन समिति का स्वरूप बदल दिया गया:
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भारत के प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
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लोकसभा में विपक्ष के नेता
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प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
इस फेरबदल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को समिति से पूरी तरह बाहर कर दिया गया और उनकी जगह एक केंद्रीय मंत्री को बिठा दिया गया। इसी प्रावधान को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), डॉ. जया ठाकुर और अन्य याचिकाकर्ताओं ने असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
इस ऐतिहासिक मामले में दोनों पक्षों के बीच तीखी कानूनी बहस देखने को मिली है:
अब देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) इस मामले की सुनवाई के लिए 5 वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक विशेष संविधान पीठ अधिसूचित करेंगे। संविधान पीठ मुख्य रूप से इन तीन बड़े संवैधानिक सवालों की समीक्षा करेगी:
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क्या संसद द्वारा बनाया गया 2023 का कानून संविधान के मूल ढांचे और चुनाव आयोग की स्वायत्तता का उल्लंघन करता है?
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क्या चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर कार्यपालिका के बहुमत वाला पैनल बनाना मनमाना (Arbitrary) और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है?
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क्या पूर्व में 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्देशों को विधायी प्रक्रिया द्वारा इस तरह बदला जा सकता है?
जब तक संविधान पीठ का अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी चयन प्रक्रिया को लेकर देश की विधिक और राजनीतिक बिरादरी में यह बहस पूरी तीव्रता से जारी रहेगी।
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