यहूदियों से दोस्ती की पींगे बढ़ा रहे असीम मुनीर? अधिकारी संग ड्रोन डील पर खड़े हुए बड़े सवाल

पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के गुप्त और विवादास्पद फैसलों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में खलबली मचा दी है। पाकिस्तान और इजरायल के बीच आधिकारिक तौर पर कूटनीतिक संबंध न होने के बावजूद, हाल ही में सामने आए एक रक्षा सौदे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व ने इजरायली सेना के एक पूर्व उच्च पदस्थ अधिकारी और रक्षा तकनीकी विशेषज्ञ के साथ एक गुप्त ड्रोन डील को अंतिम रूप दिया है। इस चौंकाने वाले घटनाक्रम के बाद से रक्षा विशेषज्ञों, राजनीतिक विश्लेषकों और खुद पाकिस्तान के भीतर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि क्या पारंपरिक रूप से इजरायल विरोधी रुख रखने वाला पाकिस्तान अब यहूदी राष्ट्र के साथ भीतरखाने नई रणनीतिक दोस्ती की इबारत लिख रहा है? इस हाई-प्रोफाइल रक्षा सौदे की भनक लगते ही वैश्विक राजनीति में समीकरणों के बदलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

असीम मुनीर का सीक्रेट डिफेंस पैक्ट: कट्टरपंथी नीतियों के बीच अचानक कैसे बदली प्राथमिकताएं?

जनरल असीम मुनीर का यह कदम इसलिए भी अत्यधिक चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि पाकिस्तान की स्थापना से लेकर अब तक वहां की सरकारों और सेना ने सार्वजनिक मंचों पर हमेशा इजरायल की खुलकर आलोचना की है और फलस्तीनी मुद्दों का समर्थन करने का दावा किया है। ऐसे में, इजरायली सेना से जुड़े एक पूर्व अधिकारी की कंपनियों के साथ ड्रोन तकनीक और सैन्य साजो-सामान की यह बड़ी डील यह साबित करती है कि कूटनीति की बंद दरवाजों के पीछे जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। रक्षा जानकारों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना अपनी पारंपरिक युद्धक क्षमताओं में आ रही भारी गिरावट और आधुनिकीकरण की सख्त जरूरत से जूझ रही है, जिसके चलते उन्हें आधुनिक और अचूक इजरायली ड्रोन तकनीक की दरकार पड़ी है। वैचारिक कट्टरता और व्यावहारिक सैन्य जरूरतों के बीच फंस चुके असीम मुनीर का यह दोहरा चरित्र अब उनके अपने देश के भीतर ही कट्टरपंथी संगठनों और राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर आ गया है, जिससे उनकी आंतरिक मुश्किलें आने वाले दिनों में काफी बढ़ सकती हैं।

इजरायली रक्षा तकनीक और गुप्त सौदे: पाकिस्तान की बदलती सैन्य मजबूरियां और वैश्विक कूटनीति

ड्रोन युद्धक तकनीक के मामले में इजरायल दुनिया के सबसे अग्रणी और उन्नत देशों में शुमार किया जाता है, और उसकी तकनीक का लोहा आज अमेरिका समेत दुनिया के तमाम बड़े देश मानते हैं। पाकिस्तान द्वारा इस तकनीक को हासिल करने के लिए इजरायली सेना के पूर्व अधिकारियों के नेटवर्क का उपयोग करना यह दर्शाता है कि पाकिस्तानी सेना अपनी सुरक्षा कमजोरियों को दूर करने के लिए अब किसी भी हद तक जाने को तैयार है। हालांकि, यह सौदा सीधे तौर पर इजरायल सरकार के साथ नहीं बल्कि परोक्ष रूप से मध्यस्थों के माध्यम से किया गया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों और इस्लामिक देशों के बीच पाकिस्तान की किरकिरी न हो सके। इसके बावजूद, खुफिया रिपोर्ट्स के लीक होने के बाद यह सौदा जगजाहिर हो चुका है, जिससे सऊदी अरब, ईरान और तुर्की जैसे देशों की नजरों में भी इस्लामाबाद की नीयत पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षेत्र की लाचारी को तो कुछ हद तक ढक सकता है, लेकिन यह देश के भू-राजनीतिक हितों के लिए एक बहुत बड़ा और खतरनाक जोखिम साबित हो सकता है।

घरेलू राजनीति और कट्टरपंथी ताकतों का विरोध: क्या असीम मुनीर संभाल पाएंगे बगावत के सुर?

जैसे-जैसे इजरायली पूर्व अधिकारी के साथ इस ड्रोन डील की खबरें पाकिस्तान के मीडिया और सोशल प्लेटफार्म्स पर सार्वजनिक हो रही हैं, वैसे-वैसे देश के भीतर धार्मिक और राजनीतिक भूचाल आना शुरू हो गया है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी राजनीतिक दल और मजहबी संगठन जनरल असीम मुनीर के इस फैसले को इस्लाम और फलस्तीन के साथ खुला विश्वासघात करार दे रहे हैं। उनका तर्क है कि जिस देश को पाकिस्तानी अवाम दशकों से अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती आई है, उसी देश के पूर्व सैन्य अधिकारियों से हथियार खरीदना देश की वैचारिक नींव के बिल्कुल खिलाफ है। इस बढ़ते आंतरिक दबाव और जनआक्रोश को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग (ISPR) की तरफ से सफाई देने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन कोई भी संतोषजनक जवाब न मिलने के कारण जनता का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। यदि यह विरोध और अधिक उग्र रूप धारण करता है, तो असीम मुनीर के लिए अपनी कुर्सी बचाना और सेना के भीतर असंतोष को रोकना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर असर: क्या अमेरिका और पश्चिम को खुश करने का एक नया राजनीतिक पैंतरा है?

इस पूरे घटनाक्रम के भू-राजनीतिक विश्लेषण से यह बात भी सामने आती है कि जनरल असीम मुनीर का यह कदम केवल सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा कूटनीतिज्ञ और पश्चिमी देशों को साधने का षड्यंत्र भी हो सकता है। वाशिंगटन और पश्चिमी देशों की नजरों में अपनी पैठ मजबूत करने तथा अमेरिकी रक्षा तंत्र का समर्थन हासिल करने के लिए कई बार ऐसे परोक्ष समझौते किए जाते हैं, जो पर्दे के पीछे से वैश्विक ताकतों को संतुष्ट करते हैं। पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली इस समय चरम पर है और उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तथा पश्चिमी देशों से लगातार वित्तीय मदद की दरकार रहती है, जिसे पाने के लिए सेना हरसंभव कूटनीतिक हथकंडे अपना रही है। हालांकि, इजरायल के साथ इस तरह के रक्षा संबंध रखना पाकिस्तान के उन तमाम दावों की पोल खोल देता है जो वह मुस्लिम जगत के रहनुमा बनने के लिए अक्सर करता रहता है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि असीम मुनीर का यह दांव पाकिस्तान को संकट से बाहर निकालता है या फिर उसे एक नए और गहरे भू-राजनीतिक संकट में धकेल देता है।

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