बांग्लादेशी सेना में बड़ा अंदरूनी फेरबदल: तारिक रहमान के आगे झुके आर्मी चीफ? मची खलबली

पड़ोसी देश बांग्लादेश की सियासत और शासन व्यवस्था इन दिनों एक अत्यंत संवेदनशील और अनिश्चित दौर से गुजर रही है। तख्तापलट और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच देश में अब सेना के भीतर से भी बड़े और चौंकाने वाले घटनाक्रम सामने आने लगे हैं। कभी कट्टरपंथ और धार्मिक एजेंडे के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश करने वाले तत्वों के लिए अब हालात बेहद प्रतिकूल होते जा रहे हैं। बांग्लादेश की सत्ता के गलियारों में चर्चाएं तेज हैं कि देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियतों में शुमार और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्रमुख चेहरे तारिक रहमान ने सेना के भीतर अपनी मजबूत पकड़ का अहसास कराना शुरू कर दिया है। हालात इस कदर बदल चुके हैं कि वर्तमान सेना प्रमुख की ताकत और उनके फैसलों के पर कतरे जाने की खबरें अंतरराष्ट्रीय गलियारों में तेजी से तैर रही हैं। मौलाना या धार्मिक चोले की आड़ में सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने की ख्वाहिश रखने वाले कई बड़े चेहरे अब इस नई राजनीतिक और सैन्य समीकरण के सामने पूरी तरह बेबस नजर आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल बांग्लादेश की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों को सकते में डाल दिया है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

मौलाना की राजनीतिक चालें और सेना पर वर्चस्व की जंग

बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में धर्म और राजनीति का मेल हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। पिछले कुछ महीनों के दौरान देश में यहन कयास लगाए जा रहे थे कि कुछ धार्मिक नेता और कट्टरपंथी ताकतें सेना के शीर्ष अधिकारियों के साथ मिलकर पर्दे के पीछे से शासन की डोर अपने हाथों में नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं। कई प्रभावशाली मौलानाओं और धार्मिक हस्तियों ने अपनी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करके प्रशासनिक नियुक्तियों और नीतिगत फैसलों को प्रभावित करना शुरू कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यह गुट देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने हिसाब से मोड़ने की जुगत में लगा हुआ था। हालांकि, बांग्लादेश की राजनीति की गहरी नब्ज समझने वाले और हाल ही में मुख्यधारा में लौटे तारिक रहमान ने इस पूरे खेल को बहुत करीब से भांप लिया। उन्होंने न केवल इस समानांतर सत्ता केंद्र को चुनौती दी, बल्कि सैन्य नेतृत्व के भीतर बढ़ते हुए ऐसे बाहरी और वैचारिक हस्तक्षेप पर गहरी आपत्ति जताई। यही वजह है कि सेना के भीतर अब एक नया वैचारिक संघर्ष शुरू हो चुका है, जहां पेशेवर सैन्य अधिकारी और राजनीतिक रूप से प्रेरित गुट आमने-सामने आते दिख रहे हैं।

तारिक रहमान की रणनीति और आर्मी चीफ के पर कतरने की चर्चा

ढाका के राजनीतिक हलकों में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि क्या वास्तव में बांग्लादेशी सेना के भीतर कोई आंतरिक तख्तापलट या नियंत्रण की बड़ी लड़ाई चल रही है? विश्वसनीय सूत्रों और खुफिया रिपोर्ट्स के हवाले से सामने आ रहा है कि तारिक रहमान ने अपनी पार्टी के प्रभाव और जमीनी समर्थन का उपयोग करते हुए सैन्य प्रशासन के शीर्ष पदों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। वर्तमान सेना प्रमुख, जो पहले अपनी स्वतंत्र कार्यशैली के लिए जाने जाते थे, अब राजनीतिक दबाव और नवनिर्मित समीकरणों के कारण अपनी शक्तियों को सीमित महसूस कर रहे हैं। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि सेना के भीतर उन अधिकारियों को साइडलाइन किया जा रहा है जो किसी खास वैचारिक या धार्मिक गुट के प्रति निष्ठा रखते थे। इसके स्थान पर देश की सुरक्षा और संविधान के प्रति वफादार समझे जाने वाले सैन्य अधिकारियों को अहम जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। इस कूटनीतिक और रणनीतिक उलटफेर ने सेना प्रमुख के विशेषाधिकारों पर एक तरह से लगाम कस दी है, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि बांग्लादेश में बिना राजनीतिक सहमति के अब कोई भी बड़ा फैसला लेना असंभव सा हो गया है।

सत्ता के गलियारों में सन्नाटा और क्षेत्रीय कूटनीति पर असर

बांग्लादेश की सेना और राजनीति के बीच चल रही इस रस्साकशी का सीधा असर देश की आम जनता और पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ना लाजिमी है। भारत समेत कई वैश्विक शक्तियां ढाका के इन घटनाक्रमों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। एक तरफ जहां देश की अर्थव्यवस्था गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के शीर्ष पर वर्चस्व की यह लड़ाई देश के भीतर और अधिक अस्थिरता पैदा कर सकती है। सेना के भीतर अनुशासन और चेन ऑफ कमांड को लेकर उठ रहे सवाल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। जिन धार्मिक और वैचारिक ताकतों को यह लग रहा था कि वे आसानी से सत्ता के समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ लेंगे, वे अब तारिक रहमान की आक्रामक राजनीतिक चालों और सेना के बदले हुए रुख के आगे लाचार साबित हो रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि बांग्लादेश की राजनीति में जनसमर्थन और संगठित राजनीतिक दलों की ताकत को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, चाहे वह किसी भी धार्मिक या वैचारिक आवरण में छिपे होने का दावा क्यों न करें।

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