नई NCERT पुस्तक में बड़ा बदलाव: उपनिषद से लेकर महाभारत के आदर्श वाक्य पाठ्यक्रम में शामिल

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने स्कूली शिक्षा प्रणाली में भारतीय संस्कृति, परंपरा और प्राचीन ज्ञान को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शैक्षणिक सत्र के बीच में जारी की गई कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी : इंडिया एंड बियांड-पार्ट टू’ में देश के कई आधुनिक और प्रमुख संस्थानों के आदर्श वाक्यों (मोटो) और उनके ऐतिहासिक स्रोतों को विस्तार से शामिल किया गया है। इन ध्येय वाक्यों को सीधे तौर पर उपनिषदों, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों से लिया गया है, ताकि छात्र देश की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से भली-भांति परिचित हो सकें।

पाठ्यपुस्तक के ‘शासन और लोक नीति’ नामक अध्याय में इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया है कि किस प्रकार स्वतंत्रता के बाद भारत के आधुनिक संस्थानों ने अपनी शासन व्यवस्था में पारंपरिक भारतीय विचारों और उच्च नैतिक मूल्यों को अपनाया है और उन्हें आज के आधुनिक लोकतंत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला है।

पुस्तक के अनुसार, भारत के राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ (जिसका अर्थ है—’सत्य की ही हमेशा जीत होती है’) को प्राचीन मुंडक उपनिषद से लिया गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि सार्वजनिक जीवन और शासन व्यवस्था में भारतीय नैतिक मूल्य हमेशा से सर्वोच्च रहे हैं। इसी प्रकार, देश की सर्वोच्च न्यायपालिका यानी भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का आधिकारिक आदर्श वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ को महाभारत के महान ग्रंथ से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—’जहां धर्म, यानी सदाचार और कर्तव्य है, वहीं विजय है।’

पुस्तक में यह भी बताया गया है कि औपनिवेशिक शासन काल के दौरान ब्रिटिश प्रभाव वाले संस्थानों में विदेशी और आयातित ध्येय वाक्यों का चलन था, जैसे कि ‘आर्डर आफ द स्टार आफ इंडिया’ का आदर्श वाक्य ‘हेवंस लाइट, आवर गाइड’ हुआ करता था। लेकिन देश की आजादी के बाद हमने अपनी प्राचीन और स्वदेशी परंपराओं की ओर रुख किया और मुंडकोपनिषद के श्लोक को अपना राष्ट्रीय प्रतीक बनाया।

एनसीईआरटी की इस नई पहल का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी के विद्यार्थियों को यह समझाना है कि हमारे देश के आधुनिक संवैधानिक और न्यायिक संस्थान केवल कागजी या सतही प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उनके मूल में भारत के गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक आदर्श निहित हैं। इन वाक्यों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से छात्र देश के प्राचीन इतिहास, नीतिशास्त्र और शासन प्रणालियों के उन मूल्यों को गहराई से समझ सकेंगे जो सदियों से भारतीय समाज का मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने भी इस कदम की सराहना की है, क्योंकि इससे स्कूली किताबों में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व और अधिक मजबूत होगा।

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