Baghban Revisited: 23 साल बाद ‘बागबान’ पर छिड़ी बहस, Gen-Z ने अमिताभ बच्चन को घेरा, बोले- ‘बेटे विलेन नहीं, बल्कि ग्रीन फ्लैग थे’

एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। साल 2003 में जब सिनेमाघरों में ‘बागबान’ रिलीज हुई थी, तो दर्शकों की आंखों में आंसू थे और बच्चों के प्रति मन में गुस्सा। रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने पीढ़ीगत संघर्ष को एक भावुक मोड़ दिया था। लेकिन अब, रिलीज के 23 साल बाद, हवा का रुख बदल गया है। आज की युवा पीढ़ी यानी Gen-Z इस कल्ट क्लासिक फिल्म को एक बिल्कुल नए नजरिए से देख रही है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही चर्चाओं ने इस फिल्म के ‘इमोशनल नैरेटिव’ को चुनौती दे दी है।

इंस्टाग्राम रील ने बदला नजरिया: ‘बूमर प्रोपेगैंडा’ है फिल्म?

हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक रील तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें एक युवा इन्फ्लुएंसर ने ‘बागबान’ को “बूमर प्रोपेगैंडा” करार दिया है। इस रील में तर्क दिया गया है कि फिल्म में बच्चों को जानबूझकर विलेन के रूप में पेश किया गया, जबकि वे केवल अपनी आधुनिक जिम्मेदारियों और व्यावहारिक जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन (आलोक राज मल्होत्रा) और हेमा मालिनी (पूजा मल्होत्रा) के चार बेटों को माता-पिता के प्रति असंवेदनशील दिखाया गया था, लेकिन अब युवा दर्शकों का कहना है कि उनकी बातें पूरी तरह गलत नहीं थीं।

अमिताभ के किरदार पर उठे सवाल: ‘बैंक में नौकरी की, फिर सेविंग्स क्यों नहीं?’

फिल्म के एक चर्चित सीन में समीर सोनी का किरदार (संजय) अपने पिता से उनकी फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर सवाल पूछता है। वर्षों तक इसे बदतमीजी माना गया, लेकिन आज के युवा पूछ रहे हैं कि एक प्रतिष्ठित बैंक में काम करने वाले व्यक्ति के पास रिटायरमेंट के लिए कोई बचत क्यों नहीं थी? रील में कहा गया, “आपका बेटा सही है, आपके पास कोई सेविंग्स क्यों नहीं है? बैंक में काम करने के बावजूद भविष्य के लिए पैसे न रखना समझदारी नहीं है।” इन्फ्लुएंसर का कहना है कि जैसे ही बेटा तार्किक सवाल पूछता है, बैकग्राउंड में इमोशनल म्यूजिक बजाकर उसे गलत साबित कर दिया जाता है।

टाइपराइटर वाला विवाद और संजय का ‘ग्रीन फ्लैग’ अवतार

फिल्म में एक और सीन है जहां देर रात टाइपराइटर चलाने पर संजय की पत्नी आपत्ति जताती है। आज के दर्शक इस पर तर्क दे रहे हैं कि संजय ने बहुत ही तहजीब से अपने पिता को समझाया था कि उसकी पत्नी को सुबह जल्दी उठकर ऑफिस जाना होता है और बच्चों को स्कूल भेजना होता है। ऐसे में नींद पूरी होना जरूरी है। सोशल मीडिया यूजर्स अब समीर सोनी के किरदार को ‘ग्रीन फ्लैग’ (सकारात्मक व्यक्तित्व) कह रहे हैं, क्योंकि वह अपनी पत्नी की जरूरतों को समझ रहा था और व्यावहारिक था।

एक्टर समीर सोनी ने दिया रिएक्शन: 20 साल बाद मिला रिडेम्पशन

दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में ‘विलेन’ बने बेटे समीर सोनी ने खुद इस वायरल रील को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। उन्होंने इस नई सोच पर खुशी जाहिर करते हुए लिखा, “आखिरकार, 20 साल बाद कुछ राहत मिली। नई जेनरेशन से बहुत प्यार है।” समीर का यह पोस्ट इस बात की पुष्टि करता है कि समय के साथ दर्शकों की सोच और पारिवारिक ढांचे की परिभाषा बदल चुकी है। क्या ‘बागबान’ वाकई मां-बाप के प्रति प्यार की कहानी थी या बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने का एक इमोशनल ड्रामा? यह बहस अब सोशल मीडिया पर नए सिरे से शुरू हो गई है

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