
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। क्लिनिकल नोट्स तैयार करने, दवाओं की जानकारी जुटाने, रिसर्च करने और मरीजों को बीमारी के बारे में समझाने के लिए डॉक्टर अब एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं।
हालांकि, साइंटिफिक पब्लिकेशन संस्था एल्सेवियर (Elsevier) की ताजा ‘क्लिनिशियन ऑफ द फ्यूचर 2026’ रिपोर्ट ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डॉक्टर मेडिकल डिसीजन सपोर्ट के लिए भी ऐसे सामान्य एआई चैटबॉट्स पर निर्भर हो रहे हैं, जिन्हें डॉक्टरी सलाह या इलाज के फैसलों के लिए तैयार ही नहीं किया गया है।
‘क्लिनिशियन ऑफ द Future 2026’ रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े
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भारत में एआई का बढ़ता दायरा: सर्वे में शामिल भारत के 48% डॉक्टर और क्लिनिशियन अपने दैनिक कामकाज में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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सामान्य एआई बनाम मेडिकल एआई: इनमें से 54% डॉक्टर चैटजीपीटी (ChatGPT) और क्लॉड (Claude) जैसे सामान्य एआई टूल्स का नियमित उपयोग करते हैं।
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स्पेशलाइज्ड मेडिकल एआई की कमी: केवल 26% डॉक्टर ही ऐसे एआई प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं जो प्रमाणित क्लिनिकल डेटा और रिसर्च जर्नल पर आधारित हैं।
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वैश्विक सर्वे में भारत आगे: 118 देशों के 2,757 स्वास्थ्यकर्मियों पर किए गए इस अध्ययन में भारत से सबसे ज्यादा 426 डॉक्टर और 112 पैरामेडिक्स शामिल थे।
सामान्य एआई (ChatGPT) के इस्तेमाल में क्या है सबसे बड़ा जोखिम?
एल्सेवियर के लीड क्लिनिकल एग्जीक्यूटिव और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राहुल गोयल के अनुसार, सामान्य एआई टूल्स इंटरनेट पर उपलब्ध अनफ़िल्टर्ड डेटा और विभिन्न स्रोतों से जानकारी उठाते हैं। इनमें से कई स्रोत अप्रमाणित या गैर-वैज्ञानिक (Unscientific) हो सकते हैं।
1. भ्रामक जानकारी और अनुमान (AI Hallucinations)
सामान्य एआई टूल कई बार सटीक वैज्ञानिक प्रमाण न होने पर भी अनुमान के आधार पर जवाब तैयार कर देते हैं। इसके विपरीत, स्पेशलाइज्ड मेडिकल एआई प्लेटफॉर्म केवल पीयर-रिव्यूड जर्नल्स, मेडिकल टेक्स्टबुक्स और क्लिनिकल गाइडलाइन्स पर काम करते हैं।
2. ‘लायबिलिटी सिंक’ (Liability Sink) का खतरा
इलाज या डायग्नोसिस में छोटी सी भी गलती मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है। डॉ. गोयल के अनुसार:
“यदि कोई डॉक्टर चैटजीपीटी या किसी सामान्य एआई की गलत सलाह पर भरोसा करके गलत इलाज करता है, तो उसकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी एआई की नहीं, बल्कि पूरी तरह से डॉक्टर की होगी। इसे ‘लायबिलिटी सिंक’ कहा जाता है, जहां अंतिम जवाबदेही हमेशा चिकित्सक पर ही रहती है।”
सामान्य एआई बनाम स्पेशलाइज्ड मेडिकल एआई
| विशेषताएं | सामान्य एआई टूल्स (ChatGPT/Claude) | स्पेशलाइज्ड मेडिकल एआई प्लेटफॉर्म |
| डेटा का स्रोत | इंटरनेट पर उपलब्ध सामान्य जानकारी | प्रमाणित किताबें, रिसर्च जर्नल, क्लिनिकल डेटा |
| सटीकता और प्रमाण | अनुमान या गलत तथ्य देने की संभावना | बिना वैज्ञानिक प्रमाण के जवाब नहीं देता |
| सुरक्षा और गोपनीयता | मरीज के डेटा लीक का जोखिम | HIPAA/मेडिकल डेटा प्रोटेक्शन नियमों के तहत सुरक्षित |
| मुख्य उद्देश्य | कंटेंट राइटिंग, कोड, सामान्य संवाद | क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट, सटीक डायग्नोसिस |
भारतीय डॉक्टर किस काम के लिए कर रहे हैं AI का इस्तेमाल?
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मेडिकल रिसर्च: बीमारियों और नए इलाज के तरीकों की नवीनतम जानकारी खोजना।
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दवाओं की जानकारी: ड्रग इंटरेक्शन और डोज से जुड़े विवरण चेक करना।
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डॉक्यूमेंटेशन: क्लिनिकल नोट्स और पेशेंट हिस्ट्री तैयार करना।
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पेशेंट एजुकेशन: मरीजों को उनकी बीमारियों और एहतियात के बारे में आसान भाषा में समझाना।
क्या एआई डॉक्टरों की जगह ले सकता है?
एक्सपर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि एआई कभी भी डॉक्टरों का विकल्प नहीं बन सकता, लेकिन यह उनका एक बेहतरीन सहायक (Assistant) साबित हो सकता है।
भारत जैसे विशाल देश में, जहां ग्रामीण और छोटे शहरों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, वहां सत्यापित मेडिकल एआई टूल्स स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार ला सकते हैं। बशर्ते अंतिम निर्णय हमेशा डॉक्टर के अनुभव, क्लिनिकल समझ और मरीज की वास्तविक स्थिति को देखकर ही लिया जाए।
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