अयोध्या के भव्य श्री राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी घोटाले (Ram Mandir Donation Theft Case) ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। जैसे-जैसे इस मामले की परतें खुल रही हैं, यह साफ होता जा रहा है कि यह कोई अचानक की गई चोरी नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक बेहद सोची-समझी और लंबी प्लानिंग थी। इस हाई-प्रोफाइल मामले के जानकार सूत्रों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर की हुंडियों (दानपात्रों) से वास्तव में कितनी रकम चोरी हुई है, इसका सटीक आंकड़ा जुटा पाना अब न सिर्फ मुश्किल, बल्कि लगभग नामुमकिन हो चुका है।
ट्रस्ट का भरोसा जीतकर ऐसे हुई थी शातिर चौकड़ी की एंट्री
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए आठ आरोपियों में से चार मुख्य किरदार—अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा और करुणेश पांडे—काफी लंबे समय से राम मंदिर परिसर में सक्रिय थे। इनकी जड़ें मंदिर में तब से जमी हुई थीं, जब भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा कैश मैनेजमेंट के लिए हायर की गई प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी की एंट्री भी नहीं हुई थी।
साल 2025 में आयोजित महाकुंभ के दौरान जब राम मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, तो हुंडियों में रिकॉर्डतोड़ दान आने लगा। उस समय अचानक बढ़े काम के बोझ को संभालने के लिए एसबीआई के पास पर्याप्त मैनपावर (कर्मचारी) उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में राम मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने उन वालंटियर्स (स्वयंसेवकों) की तलाश शुरू की, जिन्होंने अतीत में मंदिर के बड़े कार्यक्रमों में अच्छा काम किया था। इसी का फायदा उठाकर इन चारों आरोपियों को नकदी गिनने के काम में शामिल कर लिया गया।
अनुकल्प ने जीता था चंपत राय और अनिल मिश्रा का विश्वास
इस पूरे खेल का मुख्य सूत्रधार अनुकल्प मिश्रा बताया जा रहा है। वह राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण, मंदिर की पहली व दूसरी वर्षगांठ के भव्य समारोहों और अयोध्या के दीपोत्सव जैसे अति-महत्वपूर्ण और संवेदनशील आयोजनों में वालंटियर के तौर पर लगातार सक्रिय रहता था। अपनी इसी सक्रियता के दम पर वह धीरे-धीरे ट्रस्ट की अहम बैठकों का नियमित चेहरा बन गया और उसने चंपत राय व अनिल मिश्रा जैसे वरिष्ठ पदाधिकारियों का अटूट भरोसा जीत लिया।
जब ट्रस्ट के भीतर उसकी साख मजबूत हो गई, तो उसने अपने दशकों पुराने भगवा संगठनों से जुड़े होने की पृष्ठभूमि का इस्तेमाल किया। उसने अपने अन्य साथियों (अविनाश, लवकुश और करुणेश) की पहचान ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों से कराई। ट्रस्ट ने भी इनके पारिवारिक और संगठनात्मक बैकग्राउंड पर आंख मूंदकर भरोसा किया और एक अनुमान व साख के आधार पर इन वालंटियर्स को करोड़ों रुपये की नकदी गिनने की बेहद संवेदनशील जिम्मेदारी सौंप दी।
प्राइवेट एजेंसी के आने से पहले ही फैला चुके थे जाल
एसबीआई ने बाद में दान पेटियों से निकलने वाले कैश को पेशेवर तरीके से मैनेज करने के लिए वाराणसी की एक निजी एजेंसी ‘सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज’ को अधिकृत किया। इस प्राइवेट कंपनी ने कैश काउंटिंग रूम में अपने 40 नए प्रशिक्षित युवाओं को तैनात तो किया, लेकिन उनके साथ काम के सुचारू संचालन के लिए उन्हीं पुराने वालंटियर्स को भी काउंटिंग एजेंट बनाए रखा जो पहले से वहां मौजूद थे। आरोपी पहले ही पूरी व्यवस्था को समझ चुके थे और सीसीटीवी (CCTV) तथा सुरक्षा जांच की कमियों को भांपकर नोट पार करने का खेल शुरू कर चुके थे।
किस आरोपी के पास से कितनी हुई कैश रिकवरी?
अयोध्या पुलिस और जांच एजेंसियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक आरोपियों के अलग-अलग ठिकानों और करीबियों से लगभग 80 लाख रुपये की नकदी व जेवरात बरामद किए हैं, जिसका आधिकारिक ब्योरा इस प्रकार है:
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अविनाश शुक्ला: ₹20.39 लाख (सबसे अधिक कैश) और कीमती सोने-चांदी के आभूषण
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करुणेश पांडे: ₹18.63 लाख रुपये कैश
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अनुकल्प मिश्रा: ₹16.82 लाख रुपये कैश
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लवकुश मिश्रा: ₹14.25 लाख रुपये कैश
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रमाशंकर मिश्रा: ₹7.32 लाख रुपये कैश
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मनीष यादव: ₹2.00 लाख रुपये कैश
जांच का दायरा: मामले में गिरफ्तार बाकी दो अन्य आरोपी—रमाशंकर यादव उर्फ टीनू और सुभाष श्रीवास्तव सीधे तौर पर नोटों की गिनती में शामिल नहीं थे, लेकिन वे बाहर रहकर इस पैसे को खपाने और साजिश रचने के मुख्य सूत्रधार थे। पुलिस की जांच मुख्य रूप से इसी चौकड़ी के इर्द-गिर्द घूम रही है।
पदाधिकारियों की लापरवाही और चेकिंग का अभाव; क्यों नहीं पता चलेगी पूरी रकम?
इस पूरे मामले पर करीबी नजर रखने वाले सीनियर एडवोकेट प्रांशु अग्रवाल बताते हैं कि यह घटना पूरी तरह से नैतिक पतन और सिस्टम की नाकामी का एक ज्वलंत उदाहरण है। उन्होंने कहा, “जब ये वालंटियर्स दिन-रात करोड़ों रुपये के कैश से घिरे रहे, तो इनके भीतर के लालच ने इन्हें भ्रष्ट कर दिया और समय के साथ इनके नैतिक मूल्य पूरी तरह गिर गए।”
अग्रवाल ने आगे कहा कि इस महाघोटाले के लिए केवल चोर ही नहीं, बल्कि ट्रस्ट और बैंक के पदाधिकारी भी बराबर के जिम्मेदार हैं। इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील धार्मिक स्थल पर कैश काउंटिंग को लेकर बेहद कैजुअल (लापरवाह) रवैया अपनाया गया। मंदिर प्रशासन के पास कोई कड़ा ‘इंटरनल कंट्रोल’ (आंतरिक ऑडिट) और औचक चेकिंग की व्यवस्था नहीं थी। चूंकि दानपात्रों में आने वाले चढ़ावे का पहले से कोई लिखित रिकॉर्ड या रसीद नहीं होती, इसलिए यह शातिर चौकड़ी न जाने कब से और कितने करोड़ रुपये पार कर चुकी है, इसकी वास्तविक और सटीक हकीकत अब कभी भी सामने नहीं आ पाएगी।
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