जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी और देश विरोधी ताकतों के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक बहुत बड़ी कानूनी कार्रवाई की है। एनआईए ने श्रीनगर में करीब तीन दशक पहले हुए एक भीषण हिंसक हमले के मामले में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के 6 दिग्गज नेताओं के खिलाफ विशेष अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर अप्रैल 2026 में इस केस की कमान संभालने वाली एनआईए ने अपनी जांच में पाया कि यह पूरी हिंसा एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी।
आतंकी के जनाजे में भीड़ को उकसाकर कराया था हमला
यह पूरा मामला 17 जुलाई 1996 का है, जब सुरक्षाबलों की कार्रवाई में प्रतिबंधित संगठन का खूंखार आतंकवादी हिलाल अहमद बेग मारा गया था। एनआईए के मुताबिक, आतंकी की मौत के बाद हुर्रियत नेताओं ने घाटी के लोगों को भड़काने के लिए एक सोची-समझी रणनीति बनाई। उनके आह्वान पर जनाजे में हजारों की संख्या में लोग जमा हुए, जहां इन अलगाववादी नेताओं ने मंच से भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को हिंसा के लिए उकसाया।
भीड़ की आड़ में छिपे थे हथियारबंद आतंकी
साजिश का सनसनीखेज खुलासा: एनआईए की चार्जशीट के अनुसार, उस जनाजे में केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि भारी हथियारों से लैस कई आतंकवादी भी शामिल थे। हुर्रियत नेताओं के उकसाते ही इन आतंकियों ने सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों को निशाना बनाकर ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू कर दी। इसी दौरान उग्र भीड़ ने पुलिस पर भारी पथराव किया और कई सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया। इस बर्बर हमले में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
आरोपियों की लिस्ट: 3 की हो चुकी है मौत, शब्बीर शाह समेत अन्य पर शिकंजा
शुक्रवार को दाखिल की गई इस चार्जशीट में हुर्रियत के कई उन चेहरों को बेनकाब किया गया है जो सालों तक घाटी में अशांति फैलाते रहे। नामजद किए गए 6 मुख्य आरोपियों में से तीन की मौत हो चुकी है, जबकि जीवित आरोपियों पर शिकंजा कस दिया गया है:
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शब्बीर अहमद शाह (वर्तमान में जेल में बंद)
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जावेद अहमद मीर
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शकील अहमद बख्शी
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सैयद अली शाह गिलानी (दिवंगत)
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अब्दुल गनी लोन (दिवंगत)
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मोहम्मद याकूब वकील (दिवंगत)
जम्मू-कश्मीर पुलिस से एनआईए को ट्रांसफर हुआ था केस
यह मामला पिछले 30 सालों से जम्मू-कश्मीर पुलिस की फाइलों में दबा हुआ था। मामले की गंभीरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कड़ियों को देखते हुए गृह मंत्रालय ने अप्रैल 2026 में इसे एनआईए को ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। महज कुछ ही महीनों की सघन जांच और पुख्ता तकनीकी व चश्मदीद सबूत जुटाने के बाद केंद्रीय एजेंसी ने अदालत को बताया कि इस हिंसक वारदात का एकमात्र मकसद तत्कालीन नई दिल्ली सरकार को डराना और कश्मीर घाटी में हुर्रियत की कथित ताकत का अहसास कराना था।
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