चेन्नई: तमिलनाडु की सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री विजय (थलापति) ने अपने पहले ही संबोधन में राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर पूर्ववर्ती डीएमके (DMK) सरकार पर तीखा हमला बोला है। विजय का दावा है कि राज्य पर 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और सरकारी खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। इस पर पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी पलटवार किया है।
आइए समझते हैं कि आंकड़ों के आईने में तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था की क्या तस्वीर है।
1. कर्ज का आंकड़ा: क्या कहते हैं RBI के रिकॉर्ड?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, यह सच है कि तमिलनाडु भारत के सबसे ज्यादा कर्ज वाले राज्यों की सूची में शीर्ष पर है।
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उधारी की स्थिति: वित्त वर्ष 2025 के अंत तक राज्य पर कुल उधारी लगभग 9.56 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी।
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ऐतिहासिक संदर्भ: यह कर्ज अचानक नहीं हुआ है, बल्कि पिछले कई दशकों में अलग-अलग सरकारों द्वारा बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं के लिए लिया गया है।
2. कर्ज संभालने की क्षमता (Debt Sustainability)
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल ‘कर्ज की राशि’ देखकर राज्य को दिवालिया नहीं माना जा सकता। इसके लिए राज्य की जीएसडीपी (GSDP) और विकास दर को देखना जरूरी है:
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मजबूत विकास दर: तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था करीब 11.2% (2024) की दर से बढ़ रही है।
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राजस्व का आधार: राज्य का अपना कर राजस्व (SOTR) काफी मजबूत है, जिससे वह कर्ज का ब्याज चुकाने और ऋण प्रबंधन करने में सक्षम है।
3. विजय सरकार की असली चुनौती: ‘अनिवार्य खर्च’
विजय सरकार के लिए असली संकट ‘कुल कर्ज’ नहीं, बल्कि ‘राजस्व खर्च’ (Revenue Expenditure) है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार:
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वेतन, पेंशन और ब्याज: राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 62% हिस्सा केवल कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज चुकाने में चला जाता है।
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पूंजीगत व्यय की कमी: अनिवार्य खर्चों के बाद नई सड़कों, अस्पतालों या इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए बहुत कम पैसा बचता है।
4. चुनावी वादे और वित्तीय दबाव
मुख्यमंत्री विजय ने चुनाव के दौरान कई बड़े लोकलुभावन वादे किए हैं, जो खजाने पर भारी बोझ डाल सकते हैं:
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फ्री बिजली: हर महीने 200 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा।
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कल्याणकारी योजनाएं: अनुमान है कि यदि विजय अपने घोषणापत्र के सभी वादे पूरे करते हैं, तो वार्षिक कल्याणकारी खर्च 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
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सब्सिडी का बोझ: वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पहले ही 72,000 करोड़ रुपये सब्सिडी के लिए तय किए गए थे, जो कि बुनियादी ढांचे के बजट से भी अधिक है।
स्टालिन का पलटवार: “इच्छाशक्ति की कमी”
पूर्व सीएम स्टालिन ने विजय के ‘खाली खजाने’ वाले बयान पर तंज कसते हुए कहा कि यह कहना कि “सरकार के पास पैसा नहीं है,” शासन चलाने की अक्षमता को दर्शाता है। उन्होंने तर्क दिया कि पैसा हमेशा होता है, बस उसे सही तरीके से वितरित करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए।
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