पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में इस वक्त हालात पूरी तरह बेकाबू हो चुके हैं और वहां का तनाव चरम पर पहुंच गया है। स्थानीय अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन ‘जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) ने इस्लामाबाद की पाकिस्तानी सरकार को 48 घंटे का कड़ा अल्टीमेटम जारी कर दिया है। कमेटी ने दोटूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी 38 सूत्रीय मांगों को तुरंत स्वीकार नहीं किया गया, तो वे आर-पार की लड़ाई लड़ते हुए एक ‘निर्णायक और आखिरी’ दौर का देशव्यापी आंदोलन शुरू कर देंगे। आगामी 27 जुलाई 2026 को होने वाले क्षेत्रीय चुनावों के मद्देनजर, कमेटी ने राजधानी मुजफ्फराबाद की ओर एक विशाल और अभूतपूर्व जन-प्रतिरोध मार्च निकालने का भी बड़ा ऐलान किया है।
विवाद की सबसे बड़ी वजह: कश्मीरी शरणार्थियों की 12 आरक्षित सीटें
इस पूरे महा-आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों (Refugees) के लिए आरक्षित 12 विधानसभा सीटों को पूरी तरह खत्म करने की मांग है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का खुला आरोप है कि ये सीटें इस्लामाबाद सरकार को PoK की स्थानीय राजनीति और चुनावों में अवैध हस्तक्षेप व पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का एक राजनीतिक हथियार देती हैं।
वरिष्ठ पत्रकारों के आंकड़ों के अनुसार, ये 12 रिफ्यूजी सीटें पाकिस्तान के पंजाब और अन्य प्रांतों में रह रहे करीब 4.36 लाख रजिस्टर्ड शरणार्थी वोटरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरी तरफ, खुद PoK की भौगोलिक सीमा के भीतर रहने वाले लगभग 33 लाख स्थानीय वोटरों के लिए महज 33 सीटें ही उपलब्ध हैं। आलोचकों का साफ कहना है कि यह गणित लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाता है। इस बीच, 7 जून 2026 को पीओके सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि ये सीटें संवैधानिक रूप से सुरक्षित हैं और इन्हें किसी साधारण सरकारी आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए पूर्ण संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी।
38 सूत्री चार्टर: जानिए आखिर क्या हैं स्थानीय जनता की मुख्य मांगें?
रिफ्यूजी सीटों के अलावा भुखमरी और कंगाली से जूझ रही PoK की जनता ने पाकिस्तान सरकार के सामने एक लंबा मांग पत्र (चार्टर ऑफ डिमांड्स) रखा है, जिसमें प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
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सस्ती बिजली की मांग: स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके क्षेत्र की नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से पैदा होने वाली बिजली को पाकिस्तान सरकार उन्हें ही महंगे दामों पर क्यों बेच रही है? बिजली की दरों में तत्काल भारी कटौती की जाए।
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राशन पर भारी सब्सिडी: आसमान छूती रिकॉर्ड तोड़ महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए आटा, चीनी, दालों और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं पर तुरंत भारी सरकारी सब्सिडी दी जाए।
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संसाधनों पर अधिकार: PoK के प्राकृतिक संसाधनों (जंगल, खनिज, पानी) से होने वाले कुल राजस्व का एक बड़ा और मुख्य हिस्सा यहीं के विकास में खर्च होना चाहिए।
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बुनियादी ढांचा और रोजगार: बदहाल हो चुकी सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों की स्थिति को सुधारा जाए और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं।
‘आजाद कश्मीर’ का कड़वा सच: कागजी सरकार और इस्लामाबाद का डंडा
कहने को पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने स्वांग रचते हुए PoK को ‘आजाद कश्मीर’ कहता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। PoK पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद-1 के दायरे में शामिल नहीं है, जिसके कारण वहां की जनता का पाकिस्तान की नेशनल असेंबली (संसद) में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। कागजी तौर पर भले ही पीओके के पास अपनी विधानसभा, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट मौजूद है, लेकिन शासन चलाने की असली चाबी इस्लामाबाद स्थित ‘कश्मीर काउंसिल’ के पास होती है, जिसकी अध्यक्षता खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते हैं।
सबसे दमनकारी बात यह है कि पीओके के संविधान में साफ लिखा है कि कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल इस क्षेत्र के पाकिस्तान में विलय (Annexation) का विरोध नहीं कर सकता। वहां चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को अनिवार्य रूप से पाकिस्तान के साथ वफादारी और विलय का समर्थन करने की कसम खानी पड़ती है।
कुपोषण और खाद्य असुरक्षा की मार झेलती समृद्ध धरती
प्राकृतिक रूप से PoK बेहद समृद्ध इलाका है। यह क्षेत्र घने जंगलों, ग्रेफाइट, मार्बल, कीमती जेमस्टोन्स और सबसे महत्वपूर्ण जल संसाधनों से लबरेज है। पाकिस्तान के मुख्य कृषि क्षेत्रों की लगभग 70% (70 प्रतिशत) सिंचाई सिंधु नदी के पानी पर निर्भर है, जो यहीं से होकर बहती है। इसके अलावा, यहां के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पाकिस्तान की कुल बिजली का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं।
इतनी संपन्नता के बावजूद पाकिस्तान की लूट के कारण यहां के स्थानीय लोग अत्यंत गरीबी में जी रहे हैं। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, PoK की लगभग 66 प्रतिशत आबादी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है, लेकिन यहां के 57.1% (57.1 प्रतिशत) लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा (Food Insecurity) का सामना कर रहे हैं। यही नहीं, 29 प्रतिशत आबादी पूरी तरह कुपोषित है, जो खुद पाकिस्तान के राष्ट्रीय औसत (19.9%) से कहीं ज्यादा बदतर है। पहाड़ी इलाकों के 90 प्रतिशत से अधिक परिवार भोजन की भारी कमी से प्रभावित हैं, जिसने अब एक बड़े जन-विद्रोह का रूप ले लिया है।
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