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चीन की खतरनाक साजिश: CPEC के बाद अब म्यांमार-बांग्लादेश के साथ मिलकर भारत को घेरने की तैयारी; जानें क्या है ‘CMBC’ कॉरिडोर

वैश्विक भू-राजनीति और रणनीतिक मोर्चे पर चीन ने भारत के खिलाफ एक और बड़ी चक्रव्यूह रचना शुरू कर दी है। अपने एक दशक पुराने कनेक्टिविटी प्लान को दोबारा एक्टिव करते हुए बीजिंग ने इस बार भारत को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। चीन अब चीन-म्यांमार-बांग्लादेश इकोनॉमिक कॉरिडोर (CMBC) बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इस कॉरिडोर के जरिए चीन सीधे बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है, जो भारत की समुद्री संप्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक चुनौती है।

बांग्लादेशी पीएम की बीजिंग यात्रा के दौरान बना ब्लूप्रिंट

इस नए कॉरिडोर का ताना-बाना बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की 22 जून से शुरू हुई चार दिवसीय बीजिंग यात्रा के दौरान बुना गया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम तारिक रहमान के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के नाम पर ‘CMBC’ को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।

बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि लगभग 15 साल पहले ‘बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM)’ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन उसमें भारत के रुख के कारण वैसी सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी। चीनी राजदूत ने कूटनीतिक पैंतरा चलते हुए यह भी कहा कि यह नया कॉरिडोर अन्य देशों (भारत) के लिए भी खुला है, बशर्ते वे इसमें शामिल होना चाहें।

कैसा होगा नए कॉरिडोर (CMBC) का खतरनाक रूट?

यह प्रस्तावित कॉरिडोर चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से शुरू होगा और म्यांमार के मांडले तक जाएगा। इसके बाद यह कॉरिडोर दो हिस्सों में विभाजित हो जाएगा:

  1. पहला रूट: म्यांमार के प्रमुख शहर यांगून की तरफ जाएगा।

  2. दूसरा रूट (सबसे खतरनाक): म्यांमार के अशांत रखाइन राज्य में स्थित ‘क्यौकफ्यू’ गहरे समुद्री बंदरगाह (Kyaukpyu Deep Sea Port) तक जाएगा।

चीन की योजना इस रास्ते को रखाइन से आगे बढ़ाकर सीधे बांग्लादेश के चटगांव (Chittagong) और कॉक्स बाजार से जोड़ने की है। ऐसा होने से चीन को बंगाल की खाड़ी में स्थित चटगांव और मोंगला पोर्ट तक सीधा सड़क मार्ग मिल जाएगा और वह भारतीय समुद्री क्षेत्र को आसानी से बाईपास कर सकेगा।

BCIM का बदला हुआ रूप: 1990 के दशक में प्रस्तावित मूल BCIM कॉरिडोर का उद्देश्य कुनमिंग को मांडले और ढाका होते हुए सीधे भारत के कोलकाता शहर से जोड़ना था। लेकिन चीन की विवादित ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) को लेकर भारत की संप्रभुता संबंधी चिंताओं के कारण भारत ने इससे दूरी बना ली, जिसके बाद साल 2019 में चीन ने इसे अपनी आधिकारिक लिस्ट से हटा दिया था।

कॉरिडोर के रास्ते में 1,700 किमी लंबा ‘गृहयुद्ध’ का रोड़ा

इस 1,700 किलोमीटर लंबे महात्वाकांक्षी कॉरिडोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती म्यांमार की आंतरिक कानून-व्यवस्था है। यह कॉरिडोर म्यांमार के रखाइन राज्य से गुजरना है, जो इस समय दुनिया के सबसे भीषण गृहयुद्धों (Civil War) में से एक का केंद्र है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वर्ष 2026 की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार की सैन्य सरकार (जुंटा) का अब देश के केवल 20% (पांचवें हिस्से) पर ही नियंत्रण रह गया है। देश के लगभग 42% हिस्से पर विद्रोही ताकतों और जातीय सशस्त्र समूहों का कब्जा है। इसी अस्थिरता के कारण चीन और म्यांमार के बीच 2021 में हस्ताक्षरित मांडले-क्याउकफ्यू रेलवे निर्माण की समय-सीमा आज तक तय नहीं हो सकी है।

बांग्लादेश का रुख: ‘पहले रखाइन में शांति, फिर बात’

चीन के इस दबाव के बीच बांग्लादेश ने फूंक-फूंक कर कदम रखने का फैसला किया है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने 27 जून को स्पष्ट किया कि वे वर्तमान में इस चीनी प्रस्ताव की बारीकी से जांच कर रहे हैं और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। बांग्लादेश ने कड़ा रुख अपनाते हुए शर्त रखी है कि म्यांमार के रास्ते कोई भी जमीनी संपर्क तभी व्यावहारिक हो सकता है, जब म्यांमार के रखाइन राज्य में पूरी तरह से शांति बहाल हो जाए।

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’: भारत के लिए इसके क्या हैं गंभीर मायने?

चीन की यह कोशिश भारत को पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर घेरने की उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति का हिस्सा है:

  • पश्चिमी मोर्चा (CPEC): चीन पहले ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजारकर ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC) बना चुका है, जिससे उसकी पहुंच अरब सागर के ग्वादर पोर्ट तक हो चुकी है। भारत संप्रभुता के उल्लंघन के कारण CPEC का पुरजोर विरोध करता है।

  • पूर्वी मोर्चा (CMBC): अब चीन भारत के पूर्वी छोर पर म्यांमार और बांग्लादेश के बंदरगाहों के जरिए बंगाल की खाड़ी में स्थायी पैठ बनाना चाहता है। यदि चीन इसमें सफल होता है, तो वह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारतीय नौसेना के दबदबे को सीधे चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगा।

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